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Deoria News: बॉर्डर पार करते ही कई गुना बढ़ जाती है गोवंशों की कीमत

Sun, 08 Feb 2026 12:34 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
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देवरिया। पुलिस की सख्ती के बावजूद गोवंशों की तस्करी पर लगाम नहीं लग पा रही है। इसकी एक बड़ी वजह इस अवैध धंधे की मोटी कमाई है। बिहार के सिवान जिले के पशु तस्कर आए दिन देवरिया जिले के रास्ते पशुओं की खेप को बॉर्डर पार करा रहे हैं। धंधे से जुड़े सूत्र बताते हैं कि पश्चिमी बंगाल व बांग्लादेश में गोवंशों की डिमांड ज्यादा है। इससे बिहार की सीमा पार करते ही गोवंशों की कीमत अचानक कई गुना बढ़ जाती है। एक स्वस्थ गोवंश की कीमत बंगाल पहुंचते-पहुंचते सवा लाख रुपये की हो जाती है। यूपी से बंगाल तक पहुंचाने में तस्करों को एक खेप में करीब 50 हजार रुपये का मुनाफा होता है।
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पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक देवरिया जिले में 300 से अधिक पशु तस्कर सक्रिय हैं। खुखुूंदू, खामपार, श्रीरामपुर और बनकटा थाना क्षेत्र के अलावा मईल, लार व बरहज इलाके से लगातार गोवंशों की तस्करी होती है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक गोवंशों को बॉर्डर पार कराकर पश्चिम बंगाल भेजा जाता है। जहां उन्हें मोटे दाम पर बेचा जाता है।
बिहार के किशनगंज इलाके से होती है तस्करी
पशु तस्कर पश्चिमी चंपारण से पूर्णिया, अररिया होते हुए किशनगंज के रास्ते गोवंशों को पश्चिम बंगाल लेकर जाते हैं। इस अवैध धंधे में कई स्तर पर काम करने वाले लोग शामिल हैं, जिन्हें तय हिस्से के हिसाब से रकम मिलती है। सूत्रों के मुताबिक जिले के ग्रामीण इलाकों से गोवंश चोरी करने वाले गिरोह सक्रिय हैं। ये गिरोह रात के अंधेरे में पशुपालकों के दरवाजे, गोशाला से गोवंश खोल ले जाते हैं या फिर शहरी इलाके में घूमने वाले छुट्टा पशुओं को उठा ले जाते हैं। इन्हें अस्थायी ठिकानों पर इकट्ठा किया जाता है। अक्सर इन्हें पशु मेलों के पास बांधा जाता है, जिससे कि इन्हें मेला में शामिल पशु बताया जा सके। यहां से तय नेटवर्क के जरिए गोवंशों को दूसरे राज्यों की सीमा पार कराई जाती है। एक खेप में आमतौर पर पांच गोवंशों भेजी जाती हैं। इतनी संख्या की एक खेप को सुरक्षित रूप से पश्चिम बंगाल तक पहुंचाने पर तस्करों को करीब 50 हजार रुपये मिल जाते हैं। वहीं जो कैरियर गोवंशों को चोरी के स्थान से लेकर बॉर्डर तक पहुंचाते हैं, उन्हें प्रति गोवंश करीब तीन हजार रुपये दिए जाते हैं।
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कैश में दिए जाते हैं रुपये
पशु तस्करी के धंधे में शामिल युवाओं को सप्ताह में एक बार ही काम पर लगाया जाता है। इस दौरान उन्हें काम के अनुसार रुपये दिए जाते हैं। काम पूरा होने पर रुपये कैश में दिए जाते हैं। कैश बांटने और युवाओं को खोजने से लेकर गोवंशों की चोरी करने तक का काम स्थानीय तस्कर ही करते हैं।
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