- यह चेताया था क्रांतिकारी सचिंद्र नाथ सान्याल ने
- काकोरी कांड में रामप्रसाद बिस्मिल के प्रमुख साथी थे सचिंद्र
विनय कुमार राय
खुखुंदू। क्रांतिकारियों का जीवन बहुत छोटा होता है विश्वनाथ, तुम मार दिए जाओगे। यह चेताया था क्रांतिकारी सचिंद्र नाथ सान्याल ने। जो काकोरी कांड में रामप्रसाद बिस्मिल के प्रमुख साथी थे। प्रयागराज में स्नातक की पढ़ाई कर रहे क्रांतिकारी विश्वनाथ की निर्भीकता को देखकर सान्याल की उक्त टिप्पणी गलत नहीं थी। उनकी क्रांतिकारिता की जिद को देखते हुए उन्होंने साहसी विश्वनाथ को एक बड़े क्रांतिकारी की तरह एक छद्म नाम दे दिया और युवा विश्वनाथ ने सान्याल की कसौटी पर खरा उतरकर उसको चरितार्थ भी कर दिया।
क्रांतिकारी विश्वनाथ राय ने अपने छात्र जीवन में वर्ष 1929 में प्रयागराज में अंग्रेजी सेना के कैंटाेमेंट एरिया में हिंदुस्तानी फौजियों में पर्चे बांटकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सैन्य विद्रोह की स्थिति पैदा कर दी थी। सैनिकों में विद्रोह की संभावना की भनक लगते ही अंग्रेजी हुकूमत ने प्रयागराज की एक पूरी बटालियन को दक्षिण भारत स्थानांतरित कर दिया। छद्म नाम के चलते विश्वनाथ राय पकड़े नहीं गए और वहां से भागकर कानपुर की सेना छावनी के एरिया में जा पहुंचे और वहां भी पुनः क्रांतिकारी विचार और पर्चे बांटकर सैन्य विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार करने में लग गए। उनकी सक्रियता पंजाब स्थित सैन्य छावनियों तक रहती थी।
क्रांतिकारी विश्वनाथ की देश की आजादी के प्रति दीवानगी और निर्भीकता को इस तरह समझा जा सकता है कि 23 मार्च 1931 को भगत सिंह की फांसी के एक हफ्ते बाद प्रयागराज के कोतवाल को इन्होंने एक कार्यकर्ता के माध्यम से संदेश भिजवाया कि भगत सिंह के फांसी के विरोध में कल प्रयागराज विश्वविद्यालय के छात्र प्रयागराज के घंटाघर पर तिरंगा फहराएंगे, रोक सको तो रोक लो। इसके बाद तत्कालीन कोतवाल ने क्रांतिकारी विश्वनाथ के सर सुंदर लाल हास्टल के वार्डन को संदेश भिजवाया कि अपने छात्रों को तिरंगा फहराने से रोकने के लिए समझाएं, अन्यथा अंग्रेजी पुलिस गोली चलाएंगी।
अगले दिन हुआ भी यही। क्रांतिकारी विश्वनाथ ने 1931 में सबसे पहले प्रयागराज के घंटाघर पर चढ़कर तिरंगा फहराया और नीचे भी उतर गए। क्रांतिकारी विश्वनाथ के उत्साह को देखकर अन्य छात्र भी घंटाघर पर तिरंगा फहराने के लिए चढ़ गए। इसी बीच अंग्रेज पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। लगभग 15-20 राउंड फायरिंग में दो छात्र अंग्रेज पुलिस की गोली से शहीद हो गए। इस घटना के बाद विश्वनाथ राय को गिरफ्तार कर लिया गया और कठोर कारावास में जेल भेज दिया गया।
आजादी की लड़ाई के दौरान वह कई बार जेल गए और रिहा हुए। अंतिम बार अंग्रेजी हुकूमत ने जब उन्हें गिरफ्तार किया तो वह 1940 से 1946 तक काला पानी की तरह कुख्यात राजस्थान के रेगिस्तान में बने देवली जेल में रहे। वहां 15 दिनों तक भूख हड़ताल पर भी रहे। वहीं इनका संपर्क पंडित जवाहरलाल नेहरू से हुआ। (संवाद)
क्रांतिकारी की फरारी के दौरान पुरुषों की धोती से लिपटी रहती थी इकलौती बेटी इंदिरा
खुखुंदू। क्रांतिकारी विश्वनाथ के पकड़े जाने से पूर्व उनके फरारी के दौर में अंग्रेज पुलिस अक्सर उनके पैतृक गांव खुखुंदू में उन्हें पकड़ने के लिए छापे मारती रहती थी और लूटपाट के साथ ही घरों में रखे पुरुष और महिलाओं के कपड़े भी जला दिया करती थी। उस दौरान घर पर महिला के रूप में अकेली बची उनकी इकलौती दो वर्ष की बेटी इंदिरा को पुरुषों के धोतियों को ही वस्त्र के रूप में लपेट कर रहना पड़ता था। अंग्रेजों की यातनाओं के चलते बेटी को भी रुखे सूखे भोजन खाकर रहना पड़ता था। अंग्रेजी हुकूमत का यह जुल्म बहुत ही असहनीय था।
तीन लोकसभा क्षेत्रों में किया नेतृत्व, लगातार 25 वर्षों तक रहे सांसद
खुखुंदू। क्रांतिकारी विश्वनाथ राय 1952 से 1977 तक 25 वर्षों तक सांसद रहे। उन्होंने तीन लोकसभा क्षेत्रों का नेतृत्व किया था। राजनीति से संन्यास लेने के बाद वह सामाजिक कार्यों में लग गए। वह शिक्षा और खेल के बहुत ही प्रेमी थे। उन्होंने खुखुंदू में शिवाजी बाल विद्यालय, शिवाजी इंटर कॉलेज की स्थापना कराई। उनके बेटे अजय शर्मा ने पिता के सपनों को साकार करते हुए यहां उनके नाम से विश्वनाथ राय डिग्री कॉलेज की स्थापना कराई। यहां उनकी यादगार में प्रत्येक साल राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल प्रतियोगिता और कवि सम्मेलन आयोजित होता रहता है। प्रधानाचार्य आलोक राय ने बताया कि क्रांतिकारी स्व. विश्वनाथ राय खेल प्रेमी थे। इसीलिए शिवाजी इंटर कॉलेज की तरफ से फुटबाल प्रतियोगिता आयोजित कराई जाती है। संवाद