गाढ़ी कमाई डूबी, सीधे-साधे लोगों काे चूना लगाकर किनारे हो गए खिलाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी
देवरिया। तहसील के अधिकारियों और कर्मचारियों से साठगांठ कर जमीन के खिलाड़ियों ने तमाम लोगों को सीलिंग की जमीन को बेच दी है। प्रशासन की लापरवाही और लोगों की चूक से उनकी गाढ़ी कमाई तो डूब ही गई और जमीन भी हाथ से जाने की नौबत आ गई। ठगी का यह खेल दशकों से चला आ रहा है। ऐसी जमीनों पर तथाकथित प्रापर्टी डीलरों की नजर रहती है, जो लोगों को अपने झांसे लेकर भूमि का सौद कर दे रहे हैं। करीब एक माह के भीतर सामने आए मामलों में करोड़ों रुपये की भूमि इधर-उधर कर दी गई है।
सीलिंग की भूमि का खेल काफी पुराना है। रुद्रपुर और सलेमपुर में हाल के दिनों में कई मामले सामने आए हैं। जब मामले की जानकारी हुई तो करोड़ों रुपये की जमीनों की जांच जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने सीआरओ से कराई। मामला सच पाया गया और सबसे गंभीर बात तो यह रही कि तत्कालीन एसडीएम, नायब तहसीलदार सहित अन्य कर्मचारी भी इस खेल में शामिल रहे। शहर के रामनाथ देवरिया और सिविल लाइंस पर सीलिंग की भूमि के बदले लाखों रुपये लेकर बेचने वाले बैठ गए। खरीदार रुपये देकर बैनामा कराने के लिए चक्कर काटते रहे, लेकिन बैनामा नहीं हो सका है।
केस एक-
रुद्रपुर तहसील क्षेत्र में करोड़ों रुपये की भूमि सीलिंग में निकली थी। इस भूमि को तत्कालीन एसडीएम राकेश कुमार और नायब तहसीलदार ने धारा-34 एवं 229 बी के तहत दूसरे के नाम कर दिया है। इसका खुलासा कलेक्ट्रेट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष वृजबांके तिवारी की शिकायत पर हुआ है। पूरे मामले की मुख्य राजस्व अधिकारी रजनीश राय ने जांच की तो बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। जांच अधिकारी ने उपजिधिकारी के नौ वादों में किए गए भूमि नामांतरण को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है। उत्तर प्रदेश जोत सीमा आरोपण अधिनियम- 1960 तीन जनवरी 1961 को लागू हुआ था। इस अधिनियम के तहत रुद्रपुर तहसील क्षेत्र के ग्राम जंगल तरैनी में 35.18 एकड़, परसा जोकहा में 0.66 एकड़ भूमि 13 जनवरी 1989 को सरकारी घोषित हो गई। इसके अलावा भी तहसील क्षेत्र के कुछ अन्य गांवों के 7.30 एकड़ से अधिक भूमि सीलिंग के तहत निकल गई। इन जमीनों पर कुछ लोग नजर गड़ाए थे। अफसरों की मिलीभगत से धारा-34 और 229 बी के तहत उक्त भूमि दूसरे के नाम कर दिया गया है।
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केस- दो
-सलेमपुर तहसील क्षेत्र के ग्राम मझौली में सीलिंग में अतिरिक्त घोषित हुई भूमि का क्रय-विक्रय किया गया है। इतना ही नहीं मुख्य राजस्व अधिकारी ने तहसीलदार को यह भी बताया है कि इस मामले में न्यायालय का स्थगन आदेश है। इसके बावजूद भी सीलिंग की भूमि का नामांतरण किया गया है। ऐसे सभी नामांतरण नियमानुसार निरस्त कर दिया है।
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केस- तीन
शहर के रामनाथ देवरिया और सिविल लाइंस रोड निवासी एक व्यक्ति की काफी पुरानी भूमि और जमीन है, जो सीलिंग के दौरान निकली है। इसके विक्रय के लिए उसने एक व्यक्ति से करीब 80 लाख रुपये ले लिया। इसके बाद जब बैनामा की बात आई तो पता चला कि सीलिंग की भूमि है। इस कारण विवाद शुरू हो गया।
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सीलिंग की जमीन ऐसे बचे अधिवक्ता अरुण राव ने बताया कि उत्तर प्रदेश जोत सीमा आरोपण अधिनियम 1961 को लागू हुआ था। इसके बाद अतिरिक्त भूमि निर्धारण की कार्रवाई में शुरू की गई। इसके बाद पंद्रह एकड़ से अधिक की सिंचित भूमि रखने का अधिकार नहीं था। जबकि असिंचित भूमि के मामले 18 एकड़ भूमि तक है। ऐसी भूमि को बेचा नहीं जा सकता है। केवल गरीबों को पट्टा देने का प्राविधान है। भूमि खरीदने से पहले खतौनी के बारे में गहनता से पड़ताल कर लेना चाहिए। सीएल -7 पंजिका जरूर देख लेना चाहिए।
खुद के पास रिकाॅर्ड दुरुस्त नहीं, कर्मचारी और अफसर हैं मिले
सीलिंग की भूमि का पूरा ब्योरा सीएल- 7 पंजिका में दर्ज किया जाना चाहिए। पर सच तो यह है कि सीलिंग की भूमि का ब्यौरा कई सालों से दर्ज नहीं हो रहा है। इसके कारण नामांतरण हो जा रहा है। वहीं आम व्यक्ति को जानकारी नहीं मिल पा रही है कि सीलिंग भूमि है या नहीं। इसके कारण दलाल विभागीय मिलीभगत से जमीन का सौदा कर दे रहे हैं। इसमें राजस्वकर्मियों की भूमिका संदिग्ध है।
कोट
रुद्रपुर और सलेमपुर में हाल के दिनों में सीलिंग भूमि का मामला प्रकाश में आया है। नौ वादों में तत्कालीन एसडीएम और नायब तहसीलदार ने नियमों की अनदेखी कर नामांतरण का आदेश पारित किया था, जो निरस्त कर दिया गया। ऐसी भूमि का धोखे से बैनामा भी करा दिया जा रहा है। इनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए पत्र भेजा गया है।
-रजनीश राय, मुख्य राजस्व अधिकारी
कोट
भूमि संबंधी जालसाजी के मामलों में पुलिस मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करती है। 28 भू -माफियों को चिह्नित कर गुंड एक्ट की कार्रवाई और मुकदमा दर्ज किया जा चुका है। एक मामले में गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई की जा चुकी है। -राजेश कुमार, एएसपी