देवरिया जिला प्राचीन काल में जैन धर्म का बड़ा केंद्र था। यहां का खुखुंदू कस्बा जैन धर्म के नवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत की जन्मस्थली रही है। इतिहासकारों के अनुसार तीर्थंकर पुष्पदंत का जन्म इच्छाकु वंश के राजा सुग्रीव के घर हुआ था। पिता सुग्रीव ने उनका नाम सुवधि रखा था। वे साधु-संतों के संपर्क में आने के बाद खुखुंदू से 16 किलोमीटर दूर कुकुभ ग्राम में पहुंचे और वहीं तपस्या करने लगे।
जैन धर्म के नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत (सुवधिनाथ) की तपोस्थली कुकुभ ग्राम (वर्तमान नाम कहांव) को जैन धर्म महत्वपूर्ण स्थान माना गया है। इसके बावजूद यह स्थान उपेक्षित पड़ा है। जबकि इस गांव की चर्चा ब्रिटिश इतिहासकार कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में की थी।
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गांव में घुसते ही एक छोटा सा मंदिर है, जहां भगवान पुष्पदंत की गुप्त कालीन खंडित प्रतिमा को संरक्षित करने के लिए पूजा स्थल की पिछली दीवार में स्थापित कर दिया गया है। यह मंदिर उसी स्थान पर है, जहां भगवान पुष्पदंत को कैवल्य (ज्ञान) की प्राप्ति हुई थी।
इतना ही नहीं, गुप्त कालीन सम्राट स्कंदगुप्त के शासनकाल में यहां करीब 20 फिट ऊंचा एक पत्थर का स्तंभ लगवाया गया था, जिस पर ब्राह्मी लिपि में तीर्थंकर के बारे में कुछ लिखा हुआ है। पुरातत्व विभाग ने इसे संरक्षित कराते हुए बाउंड्री करा दी है। इन दोनों स्थानों पर कभी-कभार ही कोई आता-जाता है।
देवरिया जिला प्राचीन काल में जैन धर्म का बड़ा केंद्र था। यहां का खुखुंदू कस्बा जैन धर्म के नवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत की जन्मस्थली रही है। इतिहासकारों के अनुसार तीर्थंकर पुष्पदंत का जन्म इच्छाकु वंश के राजा सुग्रीव के घर हुआ था। पिता सुग्रीव ने उनका नाम सुवधि रखा था।
वे साधु-संतों के संपर्क में आने के बाद खुखुंदू से 16 किलोमीटर दूर कुकुभ ग्राम में पहुंचे और वहीं तपस्या करने लगे। वहीं उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और फिर धर्म के प्रचार के लिए देश भ्रमण पर निकल गए थे।
कहांव के जैन मंदिर के पास रहने वाले रामएकबाल मौर्या ने बताया कि 80 के दशक तक यहां ईंटों का एक बड़ा टीला था। कई पीढि़यों तक यह टीला वैसे ही पड़ा रहा। बाद में जैन धर्म के लोग आए सफाई कराकर इस वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया।
मंदिर में पूजा पाठ व देखरेख करने वाले भरत कुशवाहा ने बताया कि सफाई हुई तो पुराने ईंटों के बीच एक छोटा सा कमरा मिला, जिसमें भगवान पुष्पदंत की खंडित प्रतिमा पाई गई थी। इस प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह के पीछे वाली दीवार में संरक्षित करा दिया गया और गर्भगृह में नई प्रतिमा रखवा दी गई। जैन धर्म के लोग जब खुखुंदू आते हैं तो यहां भी आकर दर्शन पूजन करते हैं।
अभी भी बचा है ईंटों का अवशेष
मंदिर के बगल में पुराने ईंटों का अवशेष बचा हुआ है। इसके ऊपर पत्थर से बनी एक प्रतिमा का अवशेष पड़ा है। गांव वाले बताते हैं कि इस पर एक महिला का चित्र था, जो अब धुंधला हो गया है। बरसों तक इस ईंट व पत्थर पर जानवर चढ़ जाते थे।
आसपास बच्चे खेलते थे। इतने पुराने अवशेष की ओर पुरातत्व विभाग ने शायद नजर भी नहीं डाली। बाद में किसी ने लोके का एक ढांचा बनाकर मूर्ति के ऊपर रख दिया, जिससे कि लोग उस पर चढ़ें।
गुप्त कालीन स्तंभ के बारे में नहीं जानते लोग
गांव में एक स्तंभ होने की बात तो लोग जानते हैं लेकिन उसका क्या महत्व है, इसकी जानकारी नहीं है। गांव के बीच में रास्ते के किनारे इस पिलर का चबूतरा बनाकर उसे चारों तरफ से पक्की दीवार से घेरा तो गया है। इस परिसर में ताला बंद रहता है, चाबी भरत कुशवाहा के घर रहती है। ब्राह्मी लिपि में लिखे लेख का हिंदी रूपांतरण भी एक अलग पत्थर पर लिखा है। हालांकि यहां जैन धर्म के कुछेक लोग ही आते हैं।
गांव के हर मंगल कार्यक्रम में होती है इनकी पूजा
इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को गांव वाले भले ही कम जानते हों, लेकिन धार्मिक महत्व खूब देते हैं। इसीलिए आज भी यहां के लोग शादी व अन्य बड़े आयोजन में आकर इस मंदिर में माथा टेकते हैं और आशीर्वाद लेते हैं।