कंपनी कमांडर का आदेश नजरअंदाज कर रामजन्मभूमि आंदोलन में शामिल हुए देवरिया के पीएसी जवान परदेसी राम को वर्दी गंवानी पड़ी। लेकिन थोड़ा भी इसका मलाल उन्हें नहीं रहा। तीन दशक बाद इनका सपना साकार होने जा रहा है। अयोध्या न जाने की थोड़ी कसक है। लेकिन राम मंदिर निर्माण से दिल को काफी सुकून मिल रहा है।
राम मंदिर के लिए संघर्ष करने वाले पिपरा खेमकरन गांव निवासी परदेसी राम की कहानी दिलचस्प है। घर की माली हालत कमजोर होने के बावजूद संघर्षों की बदौलत 15 मई 1981 में पीएसी में भर्ती हुए, लेकिन भगवान राम के प्रति उनके दिल में अपार प्रेम रहा। इनकी तैनाती 26वीं वाहिनी पीएसी में रही। कहीं भी वह ड्यूटी पर रहते थे, लेकिन रामलला के दरबार में रामनवमी के दिन पहुंच जाते थे।
1988 में इनका कैंप प्रयागराज में था। उस समय में जब रणनीति बनाने की बात आई तो अयोध्या पहुंचे थे। 1989 में इनका कैंप बस्ती के हर्रैया में था। अयोध्या शिला पूजन में जाने वाले कारसेवकों को रोकने की ड्यूटी लगी थी। अफसरों को बिना बताए तीन दिन के लिए अयोध्या चले गए और शिला पूजन में शामिल हुए। वापस आए तो सजा के तौर पर एक सप्ताह का वेतन काटा गया। बावजूद इनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा।
वर्ष 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में रथ यात्रा निकली। उस समय इनका कैंप गोरखपुर के सिकरीगंज थाने पर लगा था। 30 अक्तूबर 1990 को यात्रा को अयोध्या पहुंचना था। कंपनी कमांडर से तीन दिन के लिए परदेसी राम ने छुट्टी मांगी। छुट्टी देने से कमांडर ने इनकार कर दिया। 28 अक्तूबर की रात को परदेसी राम पैदल ही वर्दी में अयोध्या के लिए निकल गए।