देवरिया जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह के निर्देश पर सलेमपुर स्थित रजनी हॉस्पिटल को सील करने के साथ ही पंजीकरण भी निलंबित कर दिया गया है। जिलाधिकारी ने विशेषज्ञ चिकित्सकों की समिति गठित कर पूरे प्रकरण पर विस्तृत जांच रिपोर्ट तलब की है। जिलाधिकारी ने कहा कि जांच रिपोर्ट आधार पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
सरकारी से निजी अस्पतालों को बेचे जा रहे मरीज
प्रसूताओं को सरकारी से निजी अस्पताल तक पहुंचाने के लिए बाकायदा सौदा होता है। अगर मामला गंभीर हुआ तो यह नेटवर्क गोरखपुर तक मरीजों की बोली लगा कर भेजने का काम कर रहा है। पूरी रकम के 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा के लालच में दलाल और कुछ आशा कार्यकर्ता निजी अस्पतालों में भेज दे रही हैं। इसके चलते इलाज में लापरवाही से गर्भवती असमय ही काल के गाल में समा जा रही हैं। वहीं सरकारी अस्पतालों में प्रसव दर भी घटने की बात सामने आ रही है, क्योंकि कुछ सप्ताह पहले प्रसव दर घटने पर 119 आशाओं को नोटिस सीएमओ ने दिया था।
सलेमपुर के रजनी अस्पताल के इलाज के बाद दो प्रसूताओं की मौत के बाद परिजनों ने आरोप लगाया है कि आशा कार्यकर्ता उनको निजी अस्पताल पहुंचाई थी, जहां पर इलाज के दौरान मौत हो गई। करीब छह माह पहले शहर के भटवलिया मोहल्ले के अस्पताल में प्रसूता की मौत हो गई थी। इस मामले में भटनी निवासी व्यक्ति ने मुकदमा दर्ज कराया था कि जिला अस्पताल आने के बाद एक आशा ने उसे बेहतर इलाज का झांसा देकर निजी अस्पताल पहुंचाया था।
शहर के गोरखपुर रोड स्थित एक निजी अस्पताल में प्रसूता की मौत के मामले में आशा का नाम प्रकाश में आया था। इन घटनाओं से साफ जाहिर हो रहा है कि निजी अस्पताल पहुंचाने वालों ने नेटवर्क खड़ा कर लिया है, क्योंकि सीएमओ ने जिन 119 आशाओं को नोटिस जारी किया है। इसमें स्पष्ट रूप से बताया गया कि प्रसव कम कराना है।
अब सवाल खड़ा होता है कि इन आशाओं ने निजी अस्पतालों से साठगांठ कर ली है। कमीशन के चक्कर में प्रसूताओं को शहर से लगायत, जिले के विभिन्न जगहों पर चलने वाले निजी अस्पतालों तक प्रसूताओं को भेजने का खेल किया जा रहा है।
जिला मुख्यालय से लगायत छोटे कस्बों और चौराहों पर अस्पताल खुले हुए हैं। इन सभी का दावा है कि बेहतर सुविधा अस्पताल में मौजूद है। पर सच तो यह है कि अस्पताल मानक पूरे नहीं करते। फायर का एनओसी तक नहीं है फिर भी धड़ल्ले से चल रहे हैं। ज्यादातर में न तो विशेषज्ञ डॉक्टर हैं और न सुविधाएं। कमीशन देकर मरीज मंगाए जाते हैं। उनका इलाज भी ठेके पर बुलाए गए डॉक्टर से कराया जाता है। यहां तक जिस डॉक्टर के नाम पर लाइसेंस मिला है वह भी मौजूद नहीं रहते हैं।
एंबुलेंस चालकों की भी मिलीभगत
विभिन्न जगहों से जिला अस्पताल के लिए रवाना होने वाले एंबुलेंस चालक की साठगांठ आशाओं के जरिए ही निजी अस्पताल से है। इनके जरिए निजी अस्पतालों को मरीज भेजे जा रहे हैं। यहां तक अस्पताल के मौजूद रहे निजी एंबुलेंस चालकों की नजर मरीजों पर रहती है। झांसे में लेकर मनमाफिक निजी अस्पताल में मरीजों को भेज दिया जाता है।
कार्रवाई साबित हो रही है खानापूर्ति
मानक की अनदेखी कर निजी अस्पताल चल रहे हैं। इनके खिलाफ स्वास्थ्य महकमा कार्रवाई के नाम खानापूर्ति कर रहा है। शिकायत मिलने और निरीक्षण के दौरान कार्रवाई की जाती है। पर कुछ ही दिन बाद मनमाफिक रिपोर्ट लगाकर मामले को निपटा दिया जाता है। जिसके चलते इनका मनोबल बढ़ता जा रहा है।
निजी अस्पतालों की शिकायत मिलती है तो टीम भेजकर जांच कराई जाती है। अगर किसी आशा की संलिप्तता पाई जाती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है। कुछ दिन पहले नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया था। -डॉ. राजेश झा, सीएमओ