क्षेत्र में नहीं, सोशल मीडिया पर दिखते हैं नेताजी
देवरिया (विनोद कुमार तिवारी)। संक्रमण के दौर में बदलते हालातों में समय के साथ-साथ सियासत का तरीका बदलने लगा है। मुद्दों पर आंदोलन और संघर्ष करने की वजह से नेताओं की पहचान पुराने दिनों की बात हो गई है। अब तो नेता क्षेत्र में कम और सोशल मीडिया पर ज्यादा दिख रहे हैं। बदलते परिवेश में नेताओं ने प्रचार का तरीका भी बदला है। उपचुनाव की वजह से इस समय सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाने में अधिकतर नेता जुटे हुए हैं।
देवरिया सदर विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव का बिगुल बज चुका है। एक सप्ताह बाद ही नामांकन प्रक्रिया भी शुरू होनी है। ऐसे में मतदाताओं को रिझाने के लिए ऐसे भी नेता जुटे हैं जिन्हें न तो टिकट मिला है और न ही मिलने की कोई दूर-दूर तक उम्मीद है। फिर भी जनता के बीच में अपनी पहचान इसके बहाने बनाना चाहते हैं। उपचुनाव में अपना-अपना भाग्य आजमाने वाले नेताओं पर गौर किया जाए तो दो-चार को छोड़कर जनता की समस्याओं को लेकर संघर्ष करने का किसी का कोई इतिहास नहीं रहा है। ऐसे नेता कोई विकास कार्य भी नहीं कराएं हैं। जिसको लेकर जनता के बीच में अपनी उपलब्धियां गिना सकें। फिर भी अपने-अपने सोशल मीडिया पेज पर बड़े-बड़े नेताओं के साथ अपनी फोटो लगाकर अपने को जनता का हितैषी होने का डंका पीट रहे हैं। बसपा और कुछ छोटे दलों ने प्रत्याशी उतार दिया है, लेकिन भाजपा, सपा, कांग्रेस के उम्मीदवारों की घोषणा नहीं हुई है। फिर भी दावेदार सोशल मीडिया पर ऐसी-ऐसी पोस्ट डाल रहे हैं जैसे उन्होंने लोगों की समस्याओं को लेकर कोई बहुत बड़ा आंदोलन एवं संघर्ष किया हो।
पीआर एजेंसी से चलवाते हैं सोशल मीडिया का अपना अकाउंट
राजनीति के अधिकतर खिलाड़ी ऐसे हैं, जिन्हें फेसबुक पेज, व्हाट्सएप संचालित करना नहीं आता है, लेकिन वह फेसबुक पेज और व्हाट्सएप चलाने के लिए पीआर एजेंसी का सहारा लिए हैं। एजेंसी संचालक नेताओं से इसके एवज में चार से पांच हजार रुपये महीने में लेते हैं। महापुरुषों की जयंती और त्योहारों पर पोस्ट डालते रहते हैं। कुछ नेता युवाओं को अपने साथ रखे हैं, जो उनकी हर गतिविधियों को सोशल मीडिया पर अपडेट करते रहते हैं। नेताओं के साथ जो युवाओं की टीम है वह कभी-कभी भद्दा कमेंट भी पास कर दे रही हैं। हाल ही में कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं।
क्षेत्र में रहते नहीं, बनते जनता के रहनुमा
कमावेश सभी दलों के नेताओं पर गौर किया जाए तो ज्यादातर ऐसे नेता हैं, जो क्षेत्र में नहीं रहते हैं। कुछ तो ऐसे भी नेता हैं जो हाईटेक शहरों में रहते हैं और कभी-कभार क्षेत्र में आकर सांसद, विधायक बनने का सपना देख रहे हैं। पहले लोग छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर अपने रहनुमा नेता के पास चले जाते थे, नेता उनके लिए संघर्ष भी करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। बड़े-बड़े मुद्दों पर भी राजनैतिक दलों के नेता अपने खुद के हित के चक्कर में चुप्पी साध जा रहे हैं। इसका हाल के दिनों में हुई कई घटनाएं उदाहरण है।
सोशल मीडिया पर ही बनते हैं जनता का रहनुमा
दो बार विधायक रह चुके व्यापार मंडल के प्रदेश स्तरीय नेता रवींद्र प्रताप मल्ल का कहना है कि 46 वर्ष से वह राजनीति कर रहे हैं। 1984 से विधानसभा का चुनाव भी लड़ रहे हैं, लेकिन पहले और अब की राजनीति में काफी बदलाव आया है। अब के नेता सिर्फ सोशल मीडिया पर ही अधिकतर दिखते हैं। आंदोलनों में प्रयास करते हैं कि सबसे आगे रहे ताकि उनका फोटो हो जाए और उसे सोशल मीडिया पर परोसकर अपने को जनता रहनुमा साबित कर सकें। दो बार विधायक रह चुके दीनानाथ कुशवाहा का कहना है कि राजनीति 42 साल से कर रहा हूं, लेकिन उनका विश्वास संघर्ष में है। सोशल मीडिया पर कोई एतबार नहीं है, लेकिन अब चाय पीने के दौरान भी फोटो अपलोड कर ऐसे लोग सिर्फ हवा हवाई राजनीति करते हैं। चार बार विधायक एवं एक बार सांसद रह चुके हरिवंश सहाय का कहना है कि गरीब, कमजोर, पिछड़ों पर जब भी अन्याय हुआ हमारे समय में सड़क पर नेता संघर्ष के लिए उतर जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। भ्रामक बातें भी सोशल मीडिया के माध्यम से लोग परोसने लगे हैं।