रामनगर में नीलकंठ के साथ जिस्मआरा के परिजन।
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ब्लॉक के रामनगर गांव में विजयदशमी पर नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए बिना गांव वालों का दशहरा पूरा नहीं होता है। खास बात यह है कि नीलकंठ के दर्शन गांव का ही मुस्लिम परिवार कराता है। करीब 250 वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। यह दोनों समुदाय की आपसी एकता की अनूठी मिसाल बन चुकी है।
ग्रामीणों के मुताबिक विजयदशमी पर नीलकंठ के दर्शन करने की परंपरा रामनगर गांव में सदियों पुरानी है। परंपरा के निर्वहन में सभी समुदाय के लोग साथ होते हैं। हनुमान मंदिर के पुजारी पंडित संतोष द्विवेदी कहते हैं कि यह परंपरा करीब 250 वर्षों से चली आ रही है। नीलकंठ पक्षी के दर्शन-पूजन के बाद ही गांव में शुभ कार्य आरंभ होते हैं।
रामचंद्र यादव ने बताया कि यह हमारी अनूठी परंपरा आपसी समरसता का प्रतीक है। अवकाश प्राप्त सब इंस्पेक्टर श्रीकृष्ण यादव ने बताया कि हम सभी ग्रामवासियों का बिना नीलकंठ पक्षी देखे दशहरा शुभ नहीं माना जाता है। इस दिन सुबह से गांव के प्रत्येक घर के पुरुष, महिला और बच्चों को इस पक्षी के दर्शन कराए जाते हैं। शाम को सभी लोग गांव स्थित हनुमान मंदिर पहुंचते हैं। यहां दोनों समुदाय की मौजूदगी में नीलकंठ पक्षी को उड़ाया जाता है। इसका सभी लोग दर्शन करते हैं।
वहीं, इस अनूठी परंपरा के निर्वहन की जिम्मेदारी गांव के स्व. मुख्तार के परिवार की होती है। अब उनकी पत्नी जिस्मआरा इस परंपरा का बखूबी निर्वहन करती हैं। परिवार के सदस्य करीब दस दिन पूर्व से इस पक्षी की खोज में निकलते हैं। दशहरा के एक दिन पूर्व नीलकंठ पक्षी गांव लेकर पहुंचते हैं। जिस्मआरा बताती हैं कि यह त्योहार पशु-पक्षियों पर दया दिखाने का भी संदेश देता है।
शिक्षक अजय सिंह ने बताया कि भगवान राम ने रावण के वध से पहले नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए थे। इसके बाद उन्हें विजयश्री हासिल हुई थी। देवेंद्र प्रजापति ने बताया कि वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को युवा पीढ़ी उत्साहपूर्वक आपसी सौहार्द के बीच मना रही है। यह परंपरा हम दोनों समुदाय के लोगों को एकता के सूत्र में बंध क र रहने का संदेश देता है।
हनुमान मंदिर में भजन गाते हैं लियाकत अली अंसारी
रामनगर गांव में नीलकंठ पक्षी के दर्शन से पूर्व हनुमान मंदिर में ग्रामीणों द्वारा एक साथ बैठकर भजन-कीर्तन किया जाता है। इसमें गांव के लियाकत अली अंसारी प्रमुख रूप से राम-सीता पर आधारित भजन प्रस्तुत करते हैं। इसके बाद नीलकंठ पूजन कर उसे छोड़ दिया जाता है।