होली उमंग, उल्लास और आपसी भाई चारे का त्योहार माना जाता है। इस त्योहार का व्यवहारिक और साहित्य पक्ष भी है। लेकिन पिछले कुछ समय से होली का उत्सव अपनी मूल सुंदरता को खोता जा रहा है। इसके साहित्यिक पक्ष पर फूहड़पन हावी हो गया है। यह बात रुद्रपुर के चर्चिंत फाग गायक व्यास मुनि पांडेय ने कही। वह फाग उत्सव की मिट रही परंपराओं को लेकर चिंतित दिखे। फाग साहित्य और गीत को बचाने के लिए वह फगुआ डायरी लिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि फुहड़ गीत संगीत से होलिका उत्सव के मायने बदल गए हैं।
पहले त्योहार की तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती थी। बसंत ऋतु के दस्तक देते ही गांव-गांव फाग उत्सव शुरू हो जाता। ढोल मजीरे की थाप पर रोज रात को गांव में फाग का रंग उड़ता था। रंग फाग, झुमर, उलारा की महफिल में गांव के बड़े बुजुर्ग, नौजवान और महिलाएं शामिल होतीं। लेकिन आज की युवा पीढ़ी फाग साहित्य से दूरी बनाती जा रही है।
उन्होंने कहा कि फाग उत्सव में सबसे पहले ऋतुराज बसंत की आराधना की जाती है। ऋतुपति आयें हाय गूंजन लागे भवरा यह गीत प्रकृति का चित्रण है। होली पर गिरजा हो पति साज समाज विवाहन आए जैसे फाग गाकर शिव पार्वती की आराधना की जाती है।
फाग उत्सव का अंतिम रंग उलारा होता है। जिसे महिलाएं भी गाती हैं। उन्होंने कहा कि आज कल फागुआ का संगीत साहित्य मिटता जा रहा है। फाग साहित्य को बचाने के लिए वह फगुआ डायरी लिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि फगुआ डायरी में दुुलर्भ फाग गीतों को संकलित किया जा रहा है। युवा वर्ग को इससे जोड़ने का प्रयास चल रहा है। वह युवाओं को परंपरागत फाग गाने को प्रोत्साहित करते रहते हैं।