इस्राइली तकनीकी से मछली पालन कर रहे राशिद
घर के सामने खाली जमीन में बनाई है दो टंकियां, 11 हजार मछलियां पाली
कम लागत और जगह में होगी कई गुना आय
सुनील कुमार सिंह
देवरिया। अबूबकरनगर मोहल्ले के रहने वाले राशिद खान ने इस्राइली तकनीकी से मछली पालन शुरू किया है। घर के सामने खाली पड़ी जमीन में दो टंकियों में 11 हजार मछलियां पाली हैं। कम लागत में अधिक आय होने की उम्मीद है।
मूल रूप से रामपुर कारखाना के भटनी दादन और अब अबूकरनगर मोहल्ले में रहने वाले राशिद खान एक इंटर कॉलेज के प्रबंधक हैं। कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही के साथ छह माह पूर्व वह वह आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय फैजाबाद में लगी प्रदर्शनी में गए थे। वहां से प्रेरणा लेकर उन्होंने भी नई तकनीक से मत्स्य पालन का निर्णय लिया। यू-ट्यूब पर कई दिन तक इस विधि के बारे में जानकारी ली। बिहार के लखीसराय के पुरुषोत्तम कुमार के यहां जाकर एक दिन की ट्रेनिंग ली। घर के सामने खाली जमीन में चार डाया मीटर की दो टंकी बनवाया और इसमें 11 हजार मछलियां डाली हैं। टंकी की गहराई 1.20 मीटर है। दो महीने बाद मछलियां बड़ी हो जाएंगी और इनको बाजार में बेच दिया जाएगा। उम्मीद है कि अधिक आमदनी होगी।
ऐसे बनाया गया है सिस्टम
राशिद खान ने बताया कि दोनों टंकी को बनवाने में करीब 50 हजार रुपये का खर्च आया। लोहे की जाली से गोलाकार टंकी बनाई गई है। इसके अंदर मजबूत तिरपाल लगाया गया है। दोनों टंकियों को जालीनुमा छत से घेर दिया गया है। उसके नीचे पॉलिथीन लगाई गई है, जिससे तेज धूप का सीधा असर न हो। इन मछलियों के लिए 28 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान उत्तम रहता है। पानी में अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देने के लिए मशीन लगाई गई है। बिजली नहीं रहने पर यह इन्वर्टर से भी चलता है। पानी निकालने के लिए अलग से पाइप लगी है।
बांग्लादेश से मंगाया है मछली का बच्चा
राशिद खान ने बताया कि बैंकर और सिन्ही प्रजाति के बच्चे बांग्लादेश से मंगाए गए हैं। सिन्ही मछली के बच्चे के लिए चार रुपये प्रति और बैंकर के लिए 2.25 रुपये प्रति बच्चा लगा है। तैयार होने पर सिन्ही मछली 400 रुपये और बैंकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से बाजार में बिक जाएगी।
देखभाल में नहीं है मेहनत
इस्राइली तकनीकी से मछली पालन की शुरुआत करने वाले राशिद खान जिले के पहले शख्स हैं। वे बताते हैं कि गोरखपुर में दो लोगों ने यह काम शुरू किया है। इंडोनेशिया में तो घर-घर यह काम होता है। वे बताते हैं कि इसमें कोई मेहनत नहीं है। सुबह और शाम मछलियों को दाना डालना पड़ता है। यहां के मछली पालन से हटकर इसमें बैक्टिरिया डालनी पड़ती है। यह मछली पूरी तरह आर्गेनिक है। कहीं केमिकल का उपयोग नहीं किया जाता है। पानी गंदा होने पर पाइप निकालकर बहा देते हैं। ताजा पानी भर दिया जाता है। वे बताते हैं कि लागत से दो गुना लाभ की संभावना है।