देवरिया। चायपत्ती के शौकीनों के लिए यह खबर चौंकाने वाली है। गोरखपुर मंडल में चर्चित ब्रांडों की आड़ में नकली और मिलावटी चायपत्ती का धंधा तेजी से फैल रहा है। बिहार बाॅर्डर से सटा देवरिया जिला इस पूरे नेटवर्क का प्रमुख अड्डा बन चुका है।
बिहार बाॅर्डर से पिकअप के जरिए सस्ते व घटिया क्वालिटी की चायपत्ती की खेप यहां लाई जाती है। इसे नामी कंपनियों के नकली पैक में भरकर गोरखपुर मंडी के रास्ते पूरे मंडल में सप्लाई किया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, इस काम में शामिल गिरोह दिल्ली और कोलकाता से नामी ब्रांडों जैसे टाटा, रेड लेबल, ब्रुक बॉन्ड आदि के नकली रैपर और स्टिकर मंगवाता है। इन रैपरों पर कंपनी के लोगो, कीमत और बैच नंबर तक हूबहू छपे होते हैं, जिससे उपभोक्ता असली-नकली का फर्क नहीं कर पाते।
पिछले साल गोरखपुर में नौसड़ में जो गोदाम पकड़ा गया, वहां छानबीन हुई तो पता लगा कि गौरीबाजार में बने गोदामों और किराए के मकानों में सीलिंग मशीनों के जरिए पैकिंग का काम दिन-रात चलता रहता है। इसके बाद तिवारीपुर थाना क्षेत्र में जो पिकअप पकड़ा गया था, उस पर लदा माल भी गौरीबाजार क्षेत्र से ही भेजा गया था।
जांच में सामने आया है कि हर सप्ताह शनिवार को नकली चायपत्ती की पैकिंग कर साहबगंज मंडी, गोरखपुर भेजी जाती है। वहां से अन्य जिलों कुशीनगर, महराजगंज, बस्ती और संतकबीरनगर तक पहुंचती है। छोटे कारोबारी इसे असली मानकर थोक में खरीद लेते हैं और फिर दुकानों तक सप्लाई कर देते हैं। इस तरह यह नकली चायपत्ती हजारों घरों तक पहुंच रही है।
छोटे पैकेटों में होती है अधिक मिलावट
बाजार से जुड़े सूत्रों ने बताया कि मिलावटी और नकली चायपत्ती का यह धंधा 50 ग्राम, 100 ग्राम और 250 ग्राम वाले पैकेटों में ही अधिक होती है। क्योंकि बाजार में सबसे अधिक बिक्री 100 ग्राम वाले पैकेट की होती है। इसके अलावा बहराइच से आने वाली खुली चायपत्ती भी एक बार प्रयोग करने के बाद दुबारा कलर मिलाकर तैयार की गई होती है।
खराब चायपत्ती को भरते हैं ब्रांड वाले पैकेट में
बाजार से जुड़े सूत्रों ने बताया कि गोरखपुर के कुछ धंधेबाज दार्जलिंग से सस्ती व खराब चायपत्ती औने-पौने दाम पर खरीदकर देवरिया में स्टोर करते हैं। यहां से इसकी पैकिंग कर साहबगंज मंडी में मंगा लेते हैं। वहां दो दुकानदार अपने गोदाम के जरिए इस चायपत्ती को अन्य छोटे दुकानदारों को बेच देते हैं। प्रिंट रेट से 40 प्रतिशत कम मूल्य पर मिलने वाली इस चायपत्ती में छोटे दुकानदारों को सीधा मुनाफा दिखता है। इसलिए वे इसे जल्द खरीद लेते हैं।
फेल हो चुका है नमूना
खराब चायपत्ती के मामले में नमूने जांच में फेल भी हो चुके हैं। पिछले साल गौरी बाजार में जो चायपत्ती पकड़ी गई थी, उसमें चमड़ा रंगने वाला कलर मिला था। वह कलर कैंसर का कारक था। इसके अलावा बहराइच से लाई गई पुरानी चायपत्ती को भी कड़क बनाने में रंग का प्रयोग होता है। उसका नमूना भी गोरखपुर में जांच में फेल हो चुका है।