मोती बीए की जयंती कल
स्वाधीनता की लड़ाई में मोती बीए ने काटा था जेल
फिल्मी जगत में उनके गीतों को आज भी गुनगुनाते हैं लोग
सच्चिदानंद पांडेय
बरहज। क्षेत्र के बरेजी गांव निवासी मोती बीए एक शिक्षक होने के साथ-साथ फिल्मी जगत के नामचीन हस्ती रहे हैं। हिंदी, भोजपुरी फिल्मों में उनके लिखे गीत आज भी लोग गुनगुनाते हैं। जबकि वह 1942 में स्वाधीनता की लड़ाई के दौरान साथियों के साथ दो माह जेल में रहे हैं। हालांकि बनारस जेल से रिहाई के प्रमाण मिलते हैं। गिरफ्तारी का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं होने से उनके परिजनों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित नहीं किए जाने का आज भी मलाल है।
बरेजी गांव निवासी स्व. राधाकृष्ण उपाध्याय के पुत्र मोती बीए 1942 में मुंबई के फिल्मीस्तान और लाहौर के पंचौली आर्टस में फिल्मों में गीत लिखने का कार्य शुरू किया था। जबकि 1952 में एसके इंटर कॉलेज में इतिहास पद पर प्रवक्ता के रुप में नियुक्त हुए थे। 1948 में पहली भोजपुरी फिल्म नदियां के पार में मोरे राजा हो ले चल...., दिल ले के भागा..., बजरिया में आइहो...आदि सहित 13 गीतों की रचना की। जिसे दिलीप कुमार, कामिनी कौशल ने अभिनीत किया था। जबकि संगीतकार रामचंद्र ने सुरों से सजाया था। उन्होंने कैसे कहूं, राजपूतनी, निर्मल, साजन आदि फिल्मों में आदि हिंदी फिल्मों में गीत लिखा था। मोती बीए के गीत आज भी लोगों के जेहन में हैं। मोती बीए को 1980 के दशक में राज्यपाल गणपत राव देवजी तप्पाशय ने ‘सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार’ से सम्मानित किया था। मोती बीए रुपहले पर्दे पर भोजपुरी की अलख जगाने वालों में से एक थे। उन्होंने 1952 में हिंदी फिल्म राजपूत में पहला जोगीरा लिखा था। उनके लिखे जोगीरा को हसन लाल-भगत राम ने संगीत दिया था। जबकि गायक रफीक और गायिका शमशाद बेगम थीं। वे हिंदी समाचार पत्र आज, आर्याव्रत, संसार आदि पत्र-पत्रिकाओं में सह संपादन का भी काम किए थे।
स्व. मोती बीए की जयंती कल
नंदना पश्चिमी निवासी और स्व. मोती बीए के बेटे अंजनी उपाध्याय ने बताया कि 18 जनवरी को वार्ड स्थित पैतृक आवास पर प्रत्येक वर्ष की तरह उनकी जयंती मनाई जाएगी। उन्होंने कहा जयंती पर पुस्तक विमोचन भी किया जाएगा।