देवरिया/तरकुलवा। जनपद में पशु तस्करी का धंधा तेजी से फलफूल रहा है। कई थाना क्षेत्र ऐसे हैं, जहां माह में एक से दो बार पशु तस्करी को ले जा रहा वाहन पुलिस के हत्थे चढ़ता है। कम लागत में मोटे मुनाफे के कारण इसका जाल तेजी से फैल रहा है। कमाई की लालच में ही नए-नए तस्कर इस धंधे से जुड़ गए हैं। गोवंश को कम कीमत में खरीद कर रात में सूनसान जगह पर पहुंचाते हैं, फिर पिकअप पर लोड कर बाहर भेज देते हैं। सप्ताह के प्रत्येक शुक्रवार व शनिवार को इलाके से सैकड़ों की संख्या में गोवंश बिहार, झारखंड और बंगाल के रास्ते बांग्लादेश भेजे जा रहे हैं। इसकी जानकारी होने के बावजूद तस्करों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है। मामला तब उजागर होता है जब तस्करों की गाड़ी कहीं टकरा जाती है या पुलिस को अपना हिस्सा नहीं मिलता है। तस्कर गोवंश को बेरोजगार युवकों के जरिए तीन से चार सौ रुपये का लालच देकर ग्रामीण इलाकों से सस्ते दर पर खरीदवाते हैं। फिर छोटी गंडक नदी, खनुवा, त्रिमुहानी नदी, सपही आदि नदियों के किनारे सूनसान जगह पर पशुओं को इक्कट्ठा कराते हैं। अंधेरा होने पर वे पिकअप पर लोड कर बाहर भेजते हैं।
यूपी में सस्ते दर पर आसानी से मिल जाते हैं पशु
बिहार की अपेक्षा यूपी में गो-तस्करों को पशु काफी आसानी से मिल जाते हैं। तीन से चार रुपये कम दर पर पशु तस्करों को मिल जाते हैं।
यूपी में छोटे व्यापारियों की मदद से पशुओं की खरीदारी कर बिहार, बंगाल व अन्य प्रदेश में अधिक कीमत लगाकर सौदा कर अच्छी कमाई कर लेते हैं। तस्करों का गिरोह इस तरह करता है काम : तस्करों ने जनपद के नरायनपुर, सिसवा, मुड़िकटवा, भरौटा, कंचनपुर सहित कई गांवों के अलावा बरियारपुर, हेतिमपुर, लार, भाटपार रानी, सोहागरा, सलेमपुर, बनकटा, मेहरौना क्षेत्र और कुशीनगर, महाराजगंज, बहराइच, बरेली आदि जिलों में अपना नेटवर्क बना रखा है। इसे चार पार्ट में डिवाइड किया है। नेटवर्क में अपराधी, छोटे-बड़े कारोबारी, स्थानीय युवा, एजेंट और ट्रक मालिक जुड़े हुए हैं। गिरोह में जुड़े सभी सदस्यों का काम बंटा है। ज्यादातर मामलों में एक नेटवर्क के सदस्य दूसरे को नहीं जानते हैं। गोवंश खरीदने के लिए गिरोह के सदस्य पट्टी (किलोग्राम) के भाव से सौदा करते हैं। ये सौदा ग्रामीणों और चरवाहों से किया जाता है। 100 किलो पर तीन हजार और 200 किलो पर चार हजार रुपये का भाव होता है। यह भाव शुरुआती स्तर पर रहता है। जैसे-जैसे सौदा होता है, उसकी कीमत बढ़ती जाती है।
तस्करी के काम को इस तरह देते हैं अंजाम : पशु तस्करी में लगे एजेंट गांवों और छोटे जिलों से संपर्क करता है। गोवंश की तलाश करता है। चरवाहों और ग्रामीणों से संपर्क करके छोटे कारोबारियों को सूचना देता है। एजेंट की सूचना पर छोटे व्यापारी गोवंश के मालिक से मिलते हैं और उन्हें पैसा देकर खरीदते हैं। इसके बाद युवाओं की मदद से चिह्नित स्थानों पर इकट्ठा करते हैं। बड़ी खेप तैयार होने पर बड़े कारोबारियों से सौदा होता है। बड़े कारोबारी छोटे कारोबारियों से एकत्र गोवंश की खरीदते हैं। इसके बाद दूसरे राज्यों में बेचने के लिए संपर्क करते हैं। सौदा तय होने पर गिरोह में शामिल अन्य सदस्यों की मौजूदगी में गोवंश को दूसरे राज्यों में रवाना किया जाता है। पशुओं को ले जाने वालों में अधिकांश पेशेवर तस्कर और अपराधी किस्म के लोग होते हैं। गाड़ी जब भी दूसरे राज्यों के लिए निकलती है, ट्रक-कंटेनर के आगे-पीछे चलते हैं। इनके सदस्य गाड़ी के अंदर भी बैठे रहते हैं। ये लोग हमेशा दो या तीन गाड़ियों में गोवंश लोड कर उनकी निगरानी करते हैं।
इनके पास अवैध हथियार भी होते हैं और ये लोग किसी प्रकार का विवाद होने पर उसका इस्तेमाल करने से परहेज नहीं करते हैं। इससे पहले गोवंश को ट्रक या कंटेनर में लोड कर पूरी तरह से पैक कर दिया जाता है। दो सदस्य ट्रक के अंदर रहते हैं। इनके अलावा ड्राइवर और खलासी रहते हैं। दिन में गांव की सड़कों का इस्तेमाल कर गाड़ियों को बॉर्डर या उससे कुछ दूर लाया जाता है।
रात के अंधेरे में बॉर्डर को पार कराया जाता है। तस्करी के लिए चोरी और किराए की गाड़ियों का इस्तेमाल होता है। तस्करी के दौरान यदि गाड़ी पकड़ में आती है तो चोरी और किराए की होने के कारण तस्करों के सरगना तक पुलिस पहुंच नहीं पाती। गाड़ी मालिक पुलिस के निशाने में होता है।