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43 देशों के डाक टिकट पर ढंूढा सत्य, अहिंसा

Thu, 15 Aug 2013 05:34 AM IST
Deoria
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देवरिया। उन्हें डाक टिकट संग्रह का जुनून है। बचपन का यह शौक आगे चलकर उनकी पहचान बन गई। दो वर्ष पूर्व जब बापू की याद में विश्व प्रदर्शनी दिल्ली मेें 2011 आयोजित हुआ तो डाक टिकट हासिल करने वह दिल्ली पहुंच गए। वह कहते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रदूतों से सदैव प्रेरणामिलती है।
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देश-विदेश के टिकटों में गांधी का पूरा जीवन चरित्र देखा तो इसका महत्व समझ में आया। उनके शौक ने उन्हें फिलेटलिस्ट के रूप में पहचान दिलाई है। शहर के न्यू कॉलोनी निवासी दवा व्यवसायी हिमांशु कुमार सिंह (40 वर्ष) विधि स्नातक हैं। वह समाजसेवा से भी जुड़े हैं। डाक टिकट इकट्ठा करना शौक अब जुनून बन गया है। वह बताते हैं कि कक्षा आठ में वह पढ़ रहे थे। उस समय अमेरिका से बुआ पत्र लिखा करतीं थी। पत्र में रंग-बिरंगे डाक टिकट देखकर शौक जाग गया। 1995 में लखनऊ जीपीओ में सिलेटली एकाउंट खोलकर सदस्य बन गये। वर्तमान में 150 देशों के आठ हजार डाक टिकट संग्रह कर चुके हैं। अपने संग्रह में बापू और अन्य स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों पर जारी डाक टिकट को खास बताते हैं। उनके पास यूएसए, साउथ अफ्रीका, मॉरीशस, माल्टा, चिली, रसिया, गांबिया, युगांडा, कोस्टारिका, लाइबेेरिया, आयरलैंड, ईरान के अलावा संयुक्त राष्ट्रसंघ की ओर से जारी करीब 43 डाक टिकट मौजूद हैं। इसके अलावा गांधी के जीवन पर आधारित विशेष आवरण भी संग्रहित हैं। उन्होंने चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस, बाबा खड्ग सिंह, महादेव देसाई, मीरा बेन, अबुल कलाम आजाद, भीखाजी कामा, दादा भाई नौरोजी, सरोजनी नायडू, एनी बेसेंट आदि पर डाक टिकट सहेज कर रखे हैं। वह स्कूलों और कॉलेजों में प्रदर्शनी के माध्यम से डाक टिकटों के इतिहास और महत्व के बाद में जानकारी देेते हैं। अब तक गोरखपुर, कुशीनगर, लखनऊ, आजमगढ़ और फैजाबाद में डाक प्रदर्शनी लगाकर सम्मानित हो चुके हैं।

डाक टिकटों में बापू
बापू के डाक टिकटों से उनके पूरा जीवन चरित्र और महत्व को समझा जा सकता है। वह विश्व के 104 देशों में सबसे बड़े हीरो हैं। विश्व में अकेले गांधी ही ऐसे लोकप्रिय नेता हैं जिन पर इतने अधिक डाक टिकट जारी होना एक रिकार्ड है। ब्रिटेन ने जब पहली बार किसी महापुरुष पर डाक टिकट निकाला तो वे गांधी ही थे। इससे पहले ब्रिटेन में डाक टिकट पर केवल राजा या रानी के ही चित्र छापे जाते थे। नेहरू ने ही पहल करते हुए इन चारों डाक टिकटों पर बापू को डिजाइन का हिस्सा बनाया था। इस पूरे घटनाक्रम में दिलचस्प बात यह थी कि जिंदगी भर स्वदेशी को तवज्जो देने वाले गांधी जी को सम्मानित करने के लिए जारी किए गए। इसके बाद से लेकर आज तक किसी भी भारतीय डाक टिकट की छपाई विदेश में नहीं हुई थी। इनमें से दस रुपये वाली टिकट आम व्यक्ति की पहुंच से दूर थी।
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डाक टिकटों का है दुर्लभ संग्रह ः 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या कर दी गई। आजादी के प्रथम वर्षगांठ पर 15 अगस्त 1948 को चार डाक टिकट जारी किये गए। इनमें तीन डाक टिकट इनके संग्रह में शामिल है। इनके मूल्य डेढ़ आना, साढ़े तीन आना और 12 आना रखा गया। चौथा डाक टिकट दस रुपये का था। जिसे हासिल करने की चाहत रखते हैं। यह सबसे दुर्लभ डाक टिकटें हैं। इन डाक टिकटों की छपाई स्विट्जरलैंड में हुई थी। दस रुपये की सौ अतिरिक्त डाक टिकटों को गवर्नर जनरल के आदेश पर केवल सरकारी उपयोग के लिए छापी गईं थी।
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