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दो युवाओं की कोशिशों ने बदली विद्यालय की तस्वीर

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दो युवाओं की मेहनत रंग ले आई, अभिभावक भी खुश होकर स्कूल भेजते हैं बच्चे
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दूसरों के लिए नजीर बन गया बनकटा ब्लाक के इंगुरी सराय का प्राथमिक विद्यालय
अमर उजाला ब्यूरो
भाटपाररानी। जिस स्कूल में साल भर पहले तक बमुश्किल 50 बच्चे पढ़ने आते थे, वहां अब बच्चों की संख्या 150 तक पहुंच चुकी है। पहले जिस स्कूल में अभिभावक अपने बच्चों को भेजने से परहेज करते थे वे अब वहां खुशी-खुशी भेजते हैं। नियमित गणवेश में स्कूल जा रहे बच्चों को मन से पढ़ाया भी जाता है। जी हां, झंगुरी सराय के प्राथमिक विद्यालय में ये सब संभव हुआ है दो युवाओं के संयुक्त प्रयास से।
यूपी-बिहार की सीमा पर बनकटा ब्लाक के अति पिछड़े गांवों में शुमार झंगुरी सराय में साल भर पहले तक न तो शिक्षा का स्तर कुछ खास था और न ही साक्षर होने के लिए लोगों में कोई उत्साह। ऐसे में युवा प्रधान धर्मेंद्र कुशवाहा (33) और साल भर पूर्व आए युवा प्रधानाध्यापक मनीष (35) ने जर्जर विद्यालय भवन और पठन-पाठन की व्यवस्था पटरी पर लाने का दृढ़ निश्चय किया। उरई जालौन निवासी शिक्षक मनीष के अनुसार पहली चुनौती यह थी कि कैसे भवन को दुरुस्त और साफ-सुथरा किया जाय, क्योंकि झाड़ झंखाड़ की वजह से आए दिन यहां सांप निकलते रहते थे। ग्राम प्रधान के साथ मिलकर और ग्रामीणों के सहयोग से सबसे पहले इस समस्या से निपटा गया। इसके बाद छात्र संख्या बढ़ाने और गुणवत्तापरक शिक्षा के लिए गांव का भ्रमण कर ग्रामीणों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया गया। जैसे-जैसे छात्रों के सीखने के तौर तरीकों में अपेक्षित सुधार हुआ वैसे-वैसे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। अब यह संख्या 150 के पार है।
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अन्य प्राथमिक स्कूलों से इतर यहां बच्चे टाट-पट्टी पर पढ़ाई करते हैं। स्कूल में उनके लिए बैडमिंटन, क्रिकेट और फुटबाल खेलने की भी व्यवस्था है। साफ-सुथरी रसोई में मैन्यू के अनुसार भोजन मिलता है। बालक-बालिकाओं के लिए अलग-अलग शौचालय हैं। इनकी साफ-सफाई की मॉनिटरिंग प्रधान और प्रधानाध्यापक करते हैं। गांव के बुजुर्ग भभूति शर्मा कहते हैं दोनों युवाओं का यह प्रयास अच्छे भविष्य का संकेत है।
इनसेट
स्कूल में है चाइल्ड बैंक भी
स्कूल में छात्र-छात्राओं की मदद के लिए उन्हीं द्वारा संचालित चाइल्ड बैंक भी है। इस बैंक में बच्चे घर या रिश्तेदारों से मिले रुपये जमा करते हैं। जब उन्हें कॉपी या अन्य किसी चीज की आवश्यकता होती है तो वे अपने खाते से रकम निकाल सकते हैं। विद्यालय छोड़ने पर खाते की शेष रकम उन्हें लौटा दी जाती है।
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स्कूल की दीवारें भी पढ़ाती हैं पाठ
स्कूल की दीवारों पर आकर्षक पेंटिंग और आकृतियां विद्यार्थियों को ही नहीं बल्कि राहगीरों को भी लुभाती हैं। कक्षाओं की दीवारों पर सिद्धार्थ और देवदत्त में हंस के आखेट और बचाने की कहानी बच्चों को जहां दयालुता का पाठ पढ़ाती हैं वहीं खरगोश और कछुए की कहानी दीवारों पर उकेरी देख बच्चे रोमांचित हो जाते हैं।
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