देवरिया। कान्वेंट स्कूलों के किताबी खेल में अभिभावक पिस रहे हैं। किताबों के रेट तो आसमान छू ही रहे हैं, साथ में कॉपी और अन्य सामान लेने की बाध्यता ने अभिभावकों का बजट गड़बड़ा दिया है। ऐसा में मरता क्या नहीं करता कहावत की तर्ज पर अभिभावक महंगी किताबें स्कूलों के मनपंसद दुकानों से मजबूरी में खरीद रहे हैं। सबकी अपनी पसंदीदा दुकानें हैं। हर कान्वेंट स्कूलों के आसपास इन दिनों कॉपी-किताब की दुकानें सजी हैं। जहां पर खरीदारी का समय भी तय है। दुकानें सुबह और शाम एक निश्चित अवधि के लिए खुलती हैं। दोपहर में इनका शटर डाउन रहता है। शाम के वक्त इन दुकानों पर मेला जैसा माहौल रहता है। यदि कोई अभिभावक कॉपी लेने से इन्कार कर देता है तो दुकानदार उसे किताब देने से साफ इन्कार कर देते हैं। ऐसे स्कूलों पर शिक्षा विभाग का जोर भी नहीं चल पा रहा है।
कान्वेंट स्कूलों की भरमार है
जिले में कान्वेंट स्कूलों की भरमार है। यह आंकड़ा करीब 200 हैं। इनमें छोटे-बडे़ स्कूल शामिल है। पिछले साल बेसिक शिक्षा विभाग ने बिना मान्यता के चल रहे प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ अभियान चलाया था। हर ब्लॉक से बिना मान्यता के चल रहे स्कूलों को चिन्ह्ति करते हुए नोटिस भी भेजा गया था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया विभाग ने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। अप्रैल के प्रथम सप्ताह से नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत हो रही है। कान्वेंट स्कूलों के वार्षिक परीक्षा के परिणाम घोषित हो गए हैं। ऐसे में अभिभावक बच्चों की कॉपी-किताब खरीदने में लग गए हैं। खास बात तो यह है कि हर बार स्कूल अपने ही किताब में बदलाव कर देते हैं। ऐसे में अभिभावक उसी स्कूल के बच्चों से पुरानी किताब भी नहीं खरीद पाते हैं। यहां तक की भाई अपने भाई का किताब भी इस्तेमाल नहीं कर पाता है।
किताब-कॉपी के लिए स्कूलों के दुकान तय
दस रुपये का स्केल कान्वेंट स्कूलों के चुनिंदा दुकानों पर 25 रुपये में बिक रहा हैं। बुधवार को एक अभिभावक ने किताब के साथ कॉपी और अन्य सामान लेने से मना किया तो दुकानदार ने उसे किताब देने से ही मना कर दिया। यह केवल एक अभिभावक की पीड़ा नहीं है, बल्कि कई अभिभावक इसके शिकार हो चुके हैं। चाह कर भी अभिभावक स्कूल प्रबंधन के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है। एक अभिभावक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि फीस में इजाफा तो स्कूल वालों ने किया ही है, साथ में कॉपी-किताब के नाम पर भी लूट रहे है। स्कूलों पर बकायदा नोटिस चस्पा कर रखा गया है कि किन दुकानों पर कॉपी-किताब मिलेगा।
अभिभावकों का बजट गड़बड़ाया
नया शैक्षिक सत्र शुरू होने में भले ही अभी कुछ दिन बचे हैं लेकिन अभिभावकों की जेब खाली होने लगी है। जिनके दो से अधिक बच्चे हैं वह तो अधिक परेशान हैं। क्योंकि उनकी पूरी जमा पूंजी कॉपी-किताब की खरीदारी में चला जा रहा है। ऐसे मेें उनके घरों का बजट भी गड़बड़ा गया है। कुछ अभिभावक अप्रैल माह के वेतन का इंतजार कर रहे हैं। मार्च और अप्रैल का महीन नौकरीपेशा लोगों के लिए मुश्किलों भरा होता है। क्योंकि आयकर की सीमा में आने वालों का आधा वेतन चला जाता है, जो बचता है उससे बच्चों के लिए कॉपी-किताब खरीदना मुश्किल हो जाता है।
री-एडमिशन की जगह कक्षोन्नति के नाम पर वसूल रहे शुल्क
तू डाल-डाल तो मैं पात-पात वाली कहावत निजी विद्यालय के संचालक चरितार्थ कर रहे हैं। सरकार ने री-एडमिशन के नाम पर हो रही धनउगाही पर रोक लगाई तो विद्यालय संचालक अब छात्रों से कक्षोन्नति के नाम पर शुल्क वसूल रहे हैं। हालांकि यह शुल्क री-एडमिशन से कुछ कम है। ऐसे में सरकार के आदेश को स्कूल संचालक मान नहीं रहे है। एक अभिभावक ने बताया कि सरकार जमीनी हकीकत नहीं जान पाई है। यदि सही ढंग से विद्यालयों की जांच की जाए तो अभिभावकों का कुछ बोझ कम हो सकता है। लेकिन सरकार इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।
बीएसए उपेंद्र कुमार ने कहा कि मान्यता प्राप्त विद्यालय यदि महंगा किताब बेचवा रहे होंगे तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। सीबीएसई और आईसीएससीई से मान्यता प्राप्त स्कूल उनके अधिकार में नहीं आते हैं।