की-बोर्ड पर थिरकती हैं पैरों की उंगलियां
लोगों के लिए नजीर हैं बरियारपुर के रोहित विश्वकर्मा
विष्णुदत्त पांडेय
बरियारपुर। जन्म से उसके हाथ नहीं हैं, लेकिन वह किसी और पर निर्भर नहीं। कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर पैरों की उंगलियां ऐसे थिरकती हैं, जिसे देखकर लोग दंग रह जाते हैं। बिना किसी सहयोगी के ही उसने स्नातक तक पढ़ाई की और ‘ट्रिपल सी’ के बाद अब ओ-लेवल का सर्टिफिकेट की तैयारी में जुटे हैं। बात हो रही है बरियारपुर नगर पंचायत के वार्ड नंबर सात रघुनाथपुर निवासी रोहित विश्वकर्मा की। दोनों हाथों से दिव्यांग रोहित दिव्यांगता को अभिशाप मानने वालों के लिए नजीर हैं।
जन्म के समय रोहित के दोनों हाथ न देख पिता रामकैलाश और मां गुलाबी देवी गम में डूब गई। रोहित जब पांच साल का हुआ तो पड़ोस के बच्चों को स्कूल जाते देख खुद भी पढ़ने की जिद करने लगा। मजदूरी कर परिवार चलाने वाले रामकैलाश के पास इतने संसाधन नहीं थे कि वे अपने दिव्यांग बेटे को विशिष्ट बच्चों के लिए संचालित किसी अच्छे स्कूल में भेजते। पैसे के अभाव में रोहित को पढ़ाने से कन्नी काटने लगे, मगर रोहित ने तो जैसे स्कूल जाने की ठान रखी थी। पड़ोस के बच्चों के साथ छिपकर गांव के प्राथमिक विद्यालय पर जाने लगा। बच्चों को हाथ से लिखना देख वह पैर से ही कलम पकड़ने साथ लिखना शुरू कर दिया। उसे पैरों से लिखता देखकर पिता ने भी सहयोग किया। मालीबारी इंटर कॉलेज से हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद राममनोहर महाविद्यालय मालीबारी से स्नातक किया। उसके बाद उसने कम्प्यूटर की शिक्षा ली। पहले तो उसके हाथ नहीं होने पर ट्रेनिंग सेंटर ने आनाकानी की, लेकिन रोहित की लगन देख उसे पैरों से टाइपिंग सीखने की अनुमति दी। कुछ ही महीनों में रोहित के पैरों की उंगलियां कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर तेजी से थिरकने लगी और उसने पीजीडीसीए की पढ़ाई की। तीन महीने पहले ही ‘ट्रिपल सी’ का कोर्स पूरा किया है। आज वह गांव के बच्चों को कंप्यूटर पर हिंदी टाइपिंग सिखाते हैं।
बिना किसी मदद के पूरी की बीए तक पढ़ाई
दिव्यांग होने की वजह से अगर रोहित चाहता तो उसे परीक्षा में प्रश्नों का उत्तर लिखने के लिए एक सहयोगी मिल सकता था, लेकिन अपने पैरों की लिखावट पर भरोसे के साथ बिना किसी की मदद लिए न सिर्फ हाईस्कूल की परीक्षा 58 फीसदी और इंटर की 47 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की, बल्कि 2010 में स्नातक की डिग्री भी सेकेंड श्रेणी में उत्तीर्ण की।
कंप्यूटर में पीजीडीसीए, ‘ट्रिपल सी’ की पढ़ाई कर चुके रोहित ने नवसृजित नगर पंचायत बरियारपुर कार्यालय में कंप्यूटर ऑपरेटर के रुप में आठ महीने तक काम किया। उसके बाद छोटे भाई चंद्रशेखर की मदद से गांव के चौराहे पर कंप्यूटर सेंटर व मोबाइल की दुकान खोल ली। इस दुकान से होने वाली आमदनी से ही वह पूरे परिवार का खर्च खुद उठाते हैं। आने वाले दिनों में प्रदेश में कई भर्तियां निकलने की संभावना देख इन दिनों वह ओ लेबल की पढ़ाई में जुटे हैं। रोहित विश्वकर्मा कहते हैं कि दिव्यांग होना अभिशाप नहीं है, अगर लगन और मेहनत से प्रयास किया जाए तो कुछ भी मुश्किल नहीं। कोशिश जारी है, सफलता जरूर मिलेगी।