खुशहाली के आंगन से गुम हुई रौनक
दुर्दिनों से जूझ रहा बनकटा का गांधी आश्रम उत्पत्ति केंद्र
कभी सैकड़ों लोगों की रोजगार का था जरिया
बघेल नवीन
भाटपाररानी। महात्मा गांधी की थाती को सहेजता बनकटा गांधी आश्रम उत्पत्ति केंद्र कभी सैकड़ों लोगों को रोजगार देता था, लेकिन अब दुर्दिनों से जूझ रहा है। इसकी रौनक गुम हो गई है। एक-दो शाखाओं को छोड़कर अब कोई भी उपकेंद्र नियमित नहीं खुलता।
यूपी-बिहार सीमा पर बसे यूपी के आखिरी रेलवे स्टेशन के पीछे स्थित श्री गांधी आश्रम केंद्र की शुरुआत तो सत्तर के दशक में हो गई थी, मगर दो मंजिला भवन का लोकार्पण वर्ष 1981 में हुआ। गांधी आश्रम के पास रहने वाले साहब दयाल विश्वकर्मा बताते हैं कि आश्रम के लिए अस्सी और नब्बे का दशक स्वर्णिम समय था। लगभग 50 गांवों के 500 से अधिक ग्रामीण महिलाएं-पुरुष कताई के लिए रुई ले जाते थे। गांधी आश्रम के कर्मचारी राजमंगल राजभर बताते हैं कि ट्रकों से भरकर रुई आता था। कताई करने वाले ग्रामीणों को वजन करके रुई दिया जाता था बदले में चरखे से सूत कातकर ले आते थे। वजन के मुताबिक भुगतान होता था। ऊनी शाल, अंटी, मोटा चादर आदि का उत्पादन भी होता था। कच्चा रुई जब ट्रकों से भरकर आता था तो आश्रम के उत्पत्ति केंद्र के आंगन में लगी मशीन में उसकी धुनाई होती थी। दो वर्ष हुए मशीन उखाड़कर देवरिया चली गई हैं। बड़े-बड़े बने हौंदों में कपड़ों और सूतों को डालकर रंगाई के लिए आठ-आठ कर्मचारी काम करते थे। अब डिजायनर कपड़ों के आकर्षण में न इस केंद्र की कोई पूछ रह गई है और न ही यहां बने कपड़ों की। भाटपाररानी, भिंगारी, प्रतापपुर, बनकटा, भवानी छापर में श्रीगांधी आश्रम की साख है, लेकिन भिंगारी और बनकटा को छोड़कर कोई भी केंद्र नियमित नहीं खुलता।
घरेलू आय का भी जरिया
खांटी कांग्रेसी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य श्रीकांत सिंह कहते हैं कि बुने हुए देसी कपड़े स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीक रहे। गांधी आश्रम उत्पत्ति केंद्र के वस्त्रों, चादरों की बड़ी धूम थी। गांधी आश्रम के कपड़ों को पहनना स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन देने के समान था। नेहरू बंडी की बहुत मांग थी। किसान नेता व क्षेत्र के प्रमुख गन्ना उत्पादक अखिलेश सिंह कहते हैं कि यह केंद्र गांव-गरीबों और किसानों के लिए वरदान था। गरीब परिवारों की महिलाएं रुई लाकर सूत कातती थीं और मेहनताने में कपड़े ऊनी चादर लेकर तन ढंकती थीं। यह घरेलू आय का बढ़िया जरिया था।
पीएम की पहल से जगी है उम्मीद
अनिल यादव का कहना है कि औद्योगिक क्रांति के दौर में खादी के तकनीकी रूप से पिछड़ने से यह हालत है। देश के प्रधानमंत्री के स्टाइलिश कपड़ों की वजह से खादी फिर से ट्रेंड में आया है। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में स्थिति और बेहतर होगी। युवा अश्वनी सिंह, अनिल यादव ने सहमति जताते हुए कहा कि बदलते दौर में खादी के वस्त्र दूसरे बड़ी वस्त्र कंपनियों से मुकाबला नहीं कर सके, क्योंकि डिजाइन और मार्केटिंग में पिछड़ गए। हालांकि नए दौर में युवा डिजायनर और रंगीन खादी के वस्त्रों, जैकेट, शाल कुर्ते-पायजामे खूब पसंद कर रहे हैं।