रुद्रपुर। पाई-पाई जोड़कर आशियाना बनाने वाले बहोरा दलपतपुर गांव के लोग मकानों के नदी में विलीन होने का दर्द सीने पर पत्थर रखकर सहन कर रहे हैं। जिंदगी की जद्दोजहद के बीच एक मकान बनाना कभी उनका सपना था। यह सपना सच होने के बाद भी उनकी आंखों के सामने चकनाचूर हो रहा है। गांव के दो दर्जन मकान कटकर नदी में विलीन हो चुके हैं। 12 साल से कटान का दंश झेल रहे गांववालों को शासन-प्रशासन ने हाल पर छोड़ दिया है।
गोर्रा नदी के तट पर बसे बहोरा दलपतपुर गांव का नदी नामोनिशान मिटाने पर तुली है। नदी और बंधे के बीच बसे गांव के लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके गांव यह हश्र होगा। गोर्रा नदी 2005 से गांव को छोटा कर रही है। गांव के 20 लोग मकान और करीब 200 एकड़ खेती और बाग गंवा चुके हैं। नदी गांव को काटकर आधा कर चुकी है। इस बार नदी का रौद्र रूप देख गांव में बचे-खुचे परिवार मकान खाली कर रहे हैं। बहोरा दलपतपुर के मिट रहे अस्तित्व को बचाने के लिए न ही सत्ता का साथ मिल रहा और न ही प्रशासन की सहानुभूति। नदी और बंधे के बीच बसना इस गांव का अभिशाप बन गया है। प्रशासन बजट का रोना रो रहा तो सिंचाई विभाग गांव बचाने में अपने को असमर्थ बता रहा। तीन मकान गंवा चुके रमेश मिश्र ने कहा कि गांव को बचाने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है। अवधेश मिश्र, अशोक, हनुमान, राजकुमार, शिवकुमार, विश्वनाथ, सीताराम, संजय राव, शिवशंकर मिश्र, राधेश्याम, रामसमुझ, अदालत, जालिम विनोद, पन्नेलाल के मकान कट कर नदी में बह चुके हैं। सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता एके राय ने कहा कि सिंचाई विभाग के पास गांव बचाने की कोई योजना है। गांव बचाने के लिए शासन से विशेष परियोजना की जरूरत है।