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जिन्ना के प्रस्ताव को फारूक ने ठुकराया

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आसिफ इकबाल
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देवरिया। पूर्व विधायक रहे स्व. मुहम्मद फारूक चिश्ती ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। मुहम्मद अली जिन्ना का प्रस्ताव लेकर आएं सलेमपुर के राजा को बैरंग लौटा दिया। कहा कि मुस्लिम लीग का टिकट नहीं, बल्कि देश की आजादी चाहिए। दो बार विधायक रहे फारूक, महात्मा गांधी और नेहरू के करीबी रहे। रेलवे स्टेशन रोड निवासी मौलवी मुहम्मद इस्माइल के छोटे बेटे मुहम्मद फारूक का जन्म 1901 में हुआ। उनके पिता मौलवी इस्माइल बैरिस्टर थे। परिवारवालों ने किंग एडवर्ड स्कूल (अब राजकीय इंटर कॉलेज) में दाखिला कराया। शुरुआती तालीम के दौरान देश को आजाद कराने के आंदोलन में हिस्सा लेने लगे। हालांकि बड़े भाई हामिद चिश्ती अंग्रेजों के करीबी थी, इसके चलते खान बहादुर की उपाधि मिली थी। हेडमास्टर अख्तर आदिल ने दूसरी जगह पढ़ाने के लिए भेजने का मशविरा दिया। ताकि अंग्रेजों की कार्रवाई से बच सके। इसके बाद इलाहाबाद गए लेकिन कुछ दिन के बाद वापस लौट आएं। यहां से एसएलएसी की परीक्षा पास की। छात्रों की पहली सफल हड़ताल कराने का श्रेय है। उसी दरम्यान महात्मा गांधी के संपर्क में आएं। गांधी और नेहरू जिले में आए तो रेलवे स्टेशन रोड स्थित चिश्ती हाउस में गए। बकौल अनवारूल हक चिश्ती, जंग-ए-आजादी के अहम किरदार और महात्मा गांधी के करीबी मौलाना मजहरूल हक की कोशिशों के बाद उनके बड़े भाई हामिद चिश्ती ने अंग्रेजों का साथ छोड़ा और आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। इसके चलते आजादी के दीवानों के लिए चिश्ती हाउस ठिकाना हो गया। प्रदेश में 1950 में चार विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस के देवरिया में फारूक चिश्ती जीत हासिल कर सके। इसके अलावा 1952 में आम चुनाव में जीते और 1957 में भी विजयी हुए, लेकिन 1962 में पराजित हो गए। 1967 में तीसरी बार विधायक बने। 1968 में उनका इंतकाल हो गया।
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