नीलांबुज मिश्र
सलेमपुर। नदियां उफान पर आईं तो जिले में बाढ़ से तबाही मचना तय है। मांग के अनुसार बाढ़ विभाग को सिर्फ 15 फीसदी धन ही शासन से मिला है। इस वजह से बेहतर तरीके से बंधों का मरम्मत नहीं हो सका। कटान रोकने का भी कोई इंतजाम नहीं है। इसको लेकर जहां विभाग चिंतित है, वहीं तटवर्ती गांव के लोग दहशतजदा हैं। सुरक्षा के सवाल पर विभागीय अफसर धन की कमी का रोना रो रहे हैं।
जिले में चार प्रमुख नदियां गोर्रा, घाघरा, राप्ती और छोटी गंडक है। सर्वाधिक बंधे रुद्रपुर इलाके में है। इसके लिए यहां बाढ़ के दिनों में खतरा ज्यादा रहता है। बंधों के मरम्मत के लिए बाढ़ खंड विभाग ने शासन से चार करोड़ रुपये की मांग की थी, लेकिन मात्र 50 लाख रुपये मिला। कम धन के कारण जरूरी बंधों का रेनकट और रेग्युलेटरों का मरम्मत करा दिया गया। किसी भी कटान स्थलों पर बंबू क्रेक या बोल्डर नहीं गिराया गया। इससे नदी में पानी का दबाव बढ़ने से तटवर्ती गांवों में बाढ़ आने की आशंका है। घाघरा नदी के किनारे छित्तपुर, देवसिया, भागलपुर, बलिया, धरहरा, खरवनिया, पिंडी, आदर्शनगर, कौसड़, खेमादेई, चुरिया आदि गांव हैं। गांववालों की माने तो बाढ़खंड विभाग आग लगने पर कुंआ खोदता है। इसलिए बाढ़ से बचाव में असफल हो जाता है। शुरूआती दौर में धन की कमी बताकर बंधों का सही तरीके से मरम्मत नहीं होता है। इसका खामियाजा तटवर्ती गांववालों और किसानों को भुगतना पड़ता है। छोटी गंडक नदी किनारे बनकटा मिश्र, मालीबारी, बनकटा शंभू, बड़का गांव करमुआ आदि गांव बसा है। वर्ष 1998 में इन गांवों के लोग बाढ़ के कहर से गुजर चुके हैं। इसकी वजह से नदियों में पानी बढ़ने पर बाढ़ का भय सताने लगता है। इस बाबत बाढ़ खंड के एक्सईएन वीरेंद्र सिंह ने बताया कि जिले के बंधों की मरम्मत और कटान रोकने के लिए चार करोड़ का मांग शासन को भेजा गया था। लेकिन मात्र पचास लाख रुपये मिला। इससे बंधों का रेनकट और जरूरी कामों को करा दिया गया है।