जीतेंद्र के पहुंचते ही घर में मचा चीत्कार
शहीद का बेटा बोला, अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाए
रोजगार की तलाश में मझला बेटा गया था गुजरात
अमर उजाला ब्यूरो
पैकौली। काहे हम गईली नौकरी करे, बाबूजी क अंतिम दर्शन तक न कर पवनी, हमरे जइसन बदनसीब केहू नाईं बा, सब बर्बाद हो गईल। यह वेदना बांसपार बैदा गांव के शहीद सत्यनारायण के मझले बेटे जीतेंद्र की है। उसकी यह वेदना सभी को मर्माहत कर रही थी। वह मंगलवार को अपने गांव पहुंचा। घर पहुंचते ही वह मां लिपट गया। रोने के अलावा कुछ भी नहीं निकल रहा था।
शहीद सत्यनारायण यादव की चार संतानों में जीतेंद्र तीसरे नंबर का है। उसने इंटर तक की पढ़ाई की। उसके बाद मन नहीं लगा। बताया जा रहा है कि जीतेंद्र पिता का दुलारा है। जीतेंद्र पहले स्थानीय स्तर पर ही नौकरी के लिए हाथ-पैर मारा, लेकिन जब सफलता नहीं मिली तो 28 मई को रोजगार की तलाश में गुजरात गया था। गुजरात पहुंचने के बाद पिता से बात हुई तो उन्होंने मन लगाकर काम करने की बात कहा था। जीतेंद्र का कहना था कि उसे क्या पता था कि यह सब हो जाएगा। रविवार की सुबह मां की तबीयत खराब होने की बात कहकर उसे घर आने के लिए कहा गया। जीतेंद्र तत्काल चल दिया। इलाहाबाद तक किसी ट्रेन से पहुंचा और फिर गांव आने के लिए दूसरी ट्रेन में सवार हुआ कि उसी दौरान एक दोस्त का फोन आया कि तुम्हारे पिता का अंतिम संस्कार होने जा रहा है, तुम अभी कहां हो? यह सुनते ही जीतेंद्र ट्रेन में ही बदहवाश हो गया। किसी तरह मंगलवार की सुबह वह गांव पहुंचा। उसके गांव पहुंचते ही एक बार फिर गांव परिवारवालों की चीत्कार से गूंज उठा। गांववालों ने किसी तरह से सभी को संभाला।
जरूरी कागजात लेकर लौटे बीएसएफ के एसआई
शहीद सत्यनारायण यादव के पार्थिव शरीर को लेकर बीएसएफ के एसआई प्रदीप कुमार समेत 13 लोग पहुंचे थे। इसमें आठ कांस्टेबल, दो हवलदार, दो एसआई पहुंचे थे। सत्यनारायण के अंतिम संस्कार के बाद जम्मू से आए एसआई प्रदीप कुमार उनके घर रुक गए। मंगलवार को उन्होंने जरूरी कागजात परिवारवालों से लिया और वापस कैंप के लिए लौट गए। बताया जा रहा है कि शहीद सत्यनारायण के परिवारवालों को मिलने वाली सहायता के लिए यह किया गया है।