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पुरवा में अंधविश्वास का मेला

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दुर्गा के रूप में घर के अंदर बैठी सुभद्रा - फोटो : अमर उजाला
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देवरिया। यह कोई धर्मस्थल नहीं, पर हर सोमवार, शुक्रवार और विशेष तिथियों पर दरबार सजता है। बीमारियों और तथाकथित भूत-प्रेत के साए से निजात की आस में सैकड़ों की भीड़ जुट रही है। चार खंभों पर पड़ी पक्की छत के नीचे लाल चुनरी के घेरे के बीच बने मंच से खुद पर देवी आने का दावा करने वाली पूर्व शिक्षामित्र सुभद्रा इन्हें दर्शन देती हैं। यहां पहुंचते ही पीड़ित स्त्री-पुरुष झूमने लगते हैं। चिकित्सक इसे साफ-साफ ढकोसला व अंधविश्वास बता रहे हैं।
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सुभद्रा शहर से सटे पुरवां गांव निवासी शिक्षक शिवकुमार यादव की पत्नी हैं। शिव के मुताबिक, दो साल पहले बीमारी से तंग सुभद्रा बनकटा शिवमंदिर दर्शन करने गईं। तब से व्यवहार बदल गया। उनपर देवी का साया मानते हुए घर के बाहर देवी मंदिर बना दिया गया। सुभद्रा ने अन्न और नमक त्याग दिया और सुबह शाम वहीं बैठने लगीं। लोगों ने उन्हें देवी के रूप में पूजना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे डेढ़ साल में यहां अच्छी-खासी भीड़ जुटने लगी।
शिवकुमार ने बताया, यहां आनेवालों के भोजन की व्यवस्था आश्रम की ओर से किया जाता है। कुशीनगर से आए कृष्ण गोपाल पांडेय यहां आने के बाद से गंभीर चर्मरोग से निजात का दावा कर रहे थे। खुखुंदू के शेरवा बभनौली गांव निवासी जयप्रकाश चौहान की पत्नी चंद्रावती, बेलडड़िया गांव निवासी पवन कुमार, कौड़ीराम चौरिया (गोरखपुर) से आईं निशा गोड़, यहां आने पर परेशानी में सुकून मिलने का दावा करती हैं।
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जंजीर से बांधकर रखे गए हैं मरीज
प्रसाद रूप में सुभद्रा आने वालों को हवन कुंड का भभूत व पानी देती हैं। बेहद संक्षेप में इन्हें सेवन करते रहने को कहती हैं। मंदिर के पास एक युवती और घर के बरामदे में एक युवक को जंजीरों से बांधकर रखा गया है। एक माह से दोनों के परिवार साथ रह रहे हैं। घरवाले इनके हाल में सुधार बता रहे हैं।

शिक्षामित्र की नौकरी छोड़ी
सुभद्रा की लाल साड़ी और सज-धज स्वयंभू साध्वी राधे मां की याद दिलाती है। वह कभी शिक्षामित्र थीं। उन दिनों अक्सर बीमार रहतीं। वर्ष 2013 में इस्तीफा दे दिया। घरवाले इलाज कराते थक गए। बताते हैं कि जब से कथित देवी का असर हुआ, स्वस्थ हैं। उनका विवाहित बेटा गुड़गांव में नौकरी करता है। बेटी वहीं बीएससी अंतिम वर्ष में पढ़ रही है।

झाड़-फूंक अंधविश्वास : डॉ. अनूप
जिला अस्पताल के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. अनूप श्रीवास्तव ने बताया कि झाड़-फूंक सिर्फ अंधविश्वास है। तनावग्रस्त व्यक्ति ऐसी जगहों पर दूसरों को देख खुद में भी हरकत महसूस करता है। उपचार छोड़िए, उल्टे इसका शरीर पर दुष्प्रभाव पड़ता है। ऐसे मरीजों को साइकोथेरेपी और दवा से ठीक किया जा सकता है।
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