विश्व विजय त्रिपाठी
रुद्रपुर। राप्ती नदी के मुहाने पर बसे गायघाट गांव के लोगों की जिदंगी उजड़ कर बसने में तबाह हो रही है। नदी गांव का दो बार भूगोल बदल चुकी है। दो बार गांव को विलीन कर चुकी नदी अब तीसरी बार नेस्तानाबूद करने के लिए नदी तेजी से कटान कर रही है। 40 वर्ष से गांव को दौड़ा रही नदी से पीछा छुड़ाने के लिए बीस परिवार बहराइच के जंगलों में जाकर बस गए। नदी के जलस्तर में तेजी से उफान देख गांव वालों को फिर बाढ़ का खतरा सताने लगा है।
करीब चार हजार की आबादी वाले गायघाट गांव के लोगों को नदी ने ऐसा जख्म दिया है कि शायद कभी भूल न पाएं। वर्ष-1978 में गांव को राप्ती नदी ने पूरी तरह से आगोश में ले लिया। इसके बाद लोग करीब दो सौ मीटर की दूरी पर स्थित अपने खेतों में बस गए। फिर भी नदी ने गांव का पीछा नहीं छोड़ा। वर्ष-1998 में दोबारा राप्ती नदी ने गांव को जद में ले लिया। दो बार नदी में मकान गंवाने के बाद बीस परिवार बहराइच के जंगलों में जाकर बस गए। नदी में घर बहने के बाद भी गायघाट गांव के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी। वह तीसरी बार बंधे के किनारे जाकर बस गए। यहां भी नदी हर वर्ष कटान करते हुए बंधे से सट कर बह रही है। कटान रोकने को ठोस उपाय नहीं होने से गांव के तबाह होने का खतरा फिर मडरा रहा है।
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संवरने का मौका नहीं दे रही नदी
रुद्रपुर। गायघाट गांव के लोग जिदंगी को बचाने में भी तबाह हैं। गांव की सुरक्षा को लेकर हाकिमों की नजर नहीं पड़ने से उनमें नाराजगी है। गांव के रामप्रवेश यादव ने कहा कि इस बार भी बाढ़ की सुरक्षा को लेकर ठोस उपाय नहीं किए गए। योगेंद्र यादव ने कहा कि गांव में बाढ़ चौकी पर कोई झांकने तक नहीं आया। विभाग कागजों में बाढ़ चौकियां चला रहा है। बरसात से सलसलाए बंधे कभी भी नदी की धारा में समा सकते हैं। श्यामलाल ने कहा कि उनका दो मकान नदी में विलीन हो चुका है। किसी तरह पूरा परिवार मेहनत कर फिर से घर बनाया है। बच्चों की जिंदगी संवारने का नदी मौका ही नहीं दे रही। बंधे और नदी के बीच में बसे राम मियादी साहनी ने कहा कि उनकी झोपड़ी कभी भी नदी में बह सकती है।