बेटे को नौकरी मिली न बना शहीद स्मारक
शहादत के एक साल भी वादों को पूरा होने की आस देख रहा शहीद का परिवार
दो जून को जम्मू के अखनूर सेक्टर में शहीद हुए थे बांसपार बैदा के सत्यनारायण
अयोध्या चौरसिया
पैकौली। वह तीन जून की ही मनहूस तारीख थी जब सत्यनारायण यादव के शहादत की खबर गांव पहुंची थी। जम्मू के अखनूर सेक्टर में हुए आतंकी हमले में गांव के लाल की शहादत ने पूरे बांसपार बैदा को स्तब्ध कर दिया था। गांव में अफसरों-नेताओं की चहलकदमी बढ़ गई थी। शहीद की स्मृतियों को संजोने और परिवार को संबल देने की तमाम घोषणाएं हुई, वादे किए गए। मगर एक साल बाद भी स्थिति जस की तस है। वादे के मुताबिक न तो शहीद के बेटे को नौकरी मिली है और न ही कोई अन्य कार्य हुआ।
बीएसएफ की 33वीं बटालियन में एएसआई के पद पर तैनात रहे बांसपार बैदा गांव निवासी सत्यनारायण यादव (55) दो जून की रात जम्मू के अखनूर सेक्टर में हुए आतंकी हमले में शहीद हो गए थे। अगले दिन सुबह छह बजे पत्नी सुशीला देवी के मोबाइल पर यह खबर आई तो हर तरफ कोहराम मच गया। पार्थिव शरीर को कंधा देने पूर्व केंद्रीय मंत्री सांसद कलराज मिश्र, कैबिनेट मंत्री सूर्य प्रताप शाही समेत सत्ताधारी दल के तमाम नेता पहुंचे थे। डीएम-एसपी के सामने सीएम को बुलाने की जिद पर अड़े परिजनों ने अंतिम संस्कार से इन्कार कर दिया था। कलराज मिश्र ने फोन पर सीएम से वार्ता कराते हुए उन्हें राजी किया। प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद कृषि मंत्री ने वादा किया था कि सरकार शहीद के परिजनों को 25 लाख रुपये की आर्थिक मदद के अलावा एक बेटे को नौकरी देगी। गांव में शहीद गेट व स्मारक बनाया जाएगा और घर तक पहुंचने वाली सड़क को पक्का कर दिया जाएगा। गांव के विकास के कई अन्य वादे भी हुए थे। एक साल का समय बीतने के बाद भी सिर्फ आर्थिक सहायता देने के अलावा कोई भी वादा पूरा नहीं हो पाया है। परिजनों के साथ ग्रामीण डीएम से लगायत सीएम दरबार तक कई बार फरियाद कर चुके हैं, बावजूद नतीजा सिफर है। नौकरी के लिए योग्य दूसरे बेटे जितेंद्र के दस्तावेज जमा कराए जा चुके हैं, लेकिन नौकरी कब और कहां मिलेगी, कोई बताने वाला नहीं। यही हाल अन्य घोषणाओं का भी है।
परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य थे सत्यनारायण
पिता अयोध्या यादव के इकलौते पुत्र सत्यनारायण अपने परिवार के भी एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। तीन बेटों में सबसे बड़े शंभूनाथ (29) व जितेंद्र (26) की शादियां हो चुकी हैं। शंभूनाथ दिव्यांग हैं, जबकि जितेंद्र बेरोजगार। तीसरा बेटा राजेश (17) इंटर की पढ़ाई कर रहा है। पिता की शहादत के बदले जितेंद्र को ही नौकरी देने की सहमति बनी थी। तब से ही वह अपने दस्तावेज जमा करा चुके हैं। सरकारी नौकरी मिलने की आस में वह दूसरा काम भी नहीं शुरू कर पाए हैं। आय का एकमात्र जरिया पिता की पेंशन और पुरखों की जमीन पर खेती ही है।
पति ने देश के लिए जान दी, फिर भेदभाव क्यों
छोटे बेटे राजेश और परिवार के अन्य बच्चों के साथ शहर के उमानगर में रह रहीं शहीद सत्यनारायण की पत्नी सुशीला देवी सरकार की उपेक्षा से आहत हैं। उनका कहना है कि उनके पति भी सीमाओं की रक्षा में ही शहीद हुए, फिर मदद देने में भेदभाव क्यों। अन्य शहीदों के आश्रितों को तुरंत नौकरी सहित अन्य सुविधाएं दी र्गइं, मगर यहां बार-बार गुहार के बाद भी उपेक्षा की जा रही है। तीन बार सीएम से मिलकर फरियाद की, लेकिन सिर्फ आश्वासन ही मिला। पिता अयोध्या यादव भी बेरुखी से नाराज हैं।
इन कार्यों का हुआ था वादा
शहीद सत्यनारायण यादव के आश्रित को नौकरी, गांव में शहीद की प्रतिमा स्थापित करने, शहीद स्मारक का निर्माण व सुंदरीकरण, शहीद के घर तक चौड़ी सड़क, गांव के संपर्क मार्ग पर शहीद गेट का निर्माण, पत्नी को उचित मुआवजा, गांव को समग्र घोषित कर संपूर्ण विकास कराने का वादा किया गया था।