देवरिया। पुरानी कहावत है, घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या? फिर भी नगर पालिका के हुक्मरान घास से दोस्ती करने को आतुर हैं। वह अपने करदाताओं से वास्तविक जलकर-गृहकर तक नहीं वसूल पा रहे हैं। लगाव इतना ज्यादा है कि सालाना 40 हजार जल-गृहकर के दायरे में आने वालों से महज सात से 800 रुपये लेकर भुगतान रफा-दफा कर लिया जा रहा है। कारण जो भी रहे हों दस साल में करदाताओं के भवन का सर्वे तक नहीं किया गया। 2010 में जो भवन आवासीय थे आज वह भव्य शो रूम बन चुके हैं। बावजूद वह पुराने ढर्रे पर ही टैक्स जमा करते आ रहे हैं। ऐसे लोगों की तादाद सैकड़ों में है, जो हर साल पालिका को करोड़ों का चूना लगा रहे हैं।
जलकर-गृहकर नगर पालिका के आय का प्रमुख जरिया है। शहर के 20 हजार सरकारी, गैर सरकारी व व्यावसायिक भवनों से नगर पालिका जलकर-गृहकर वसूलती है। इसमें सैकड़ों ऐसे भवन स्वामी शामिल हैं जिनके भवन का एरिया कागजों में कुछ धरातल पर कुछ और है। आठ साल पूूर्व बनाए गए आवासीय भवन आज बड़े कॉप्लेक्स बन गए हैं। एक मंजिल से इमारत तीन मंजिल हो गई है। लोगों ने भवन का दायरा बढ़ा दिया लेकिन कर वही अदा कर रहे हैं जो आवासीय भवन बनाने के दौरान नगर पालिका ने आरोपित किया था। जबकि वर्ष 2012 से ही सभी नगरीय निकायों स्वकर निर्धारण की व्यवस्था भी लागू है। इसमें नगर पालिका कर्मी भवन स्वामियों के भवन एरिया के अनुसार कर आरोपित करते हैं। किसी प्रकार की त्रुटि प्रतीत होने पर भवन स्वामी को खुद कर निर्धारित करने की छूट दी गई है। इस व्यवस्था के पालन में भवन स्वामी रुचि नहीं ले रहे हैं। वहीं नगर पालिका के हुक्मरान सालाना हो रहे करोड़ों के नुकसान पर खामोश हैं।
क्या है जलकर-गृहकर
नगरपालिका क्षेत्र में आने वाले सभी भवन स्वामियों से वर्ग फुट के अनुसार पालिका गृहकर वसूलती है। पेयजल आपूर्ति के नाम पर जलकर वसूला जाता है। जितना टैक्स भवन का लगता है उतना ही टैक्स जलकर के रुप में भी लिया जाता है। अर्जित धनराशि नगर पालिका विकास कार्यों पर खर्च करती है।
इनका टैक्स भी मानक के अनुरुप नहीं
* केस एक: शहर के मालवीय रोड पर एक चर्चित प्लाजा का चार मंजिल भवन करीब 35 हजार रुपये टैक्स के दायरे में है। एक हजार से कम सालाना वसूल होता है जलकर-गृहकर।
* केस दो: परमार्थी पोखरे के समीप एक चिकित्सक का व्यवसायिक भवन करीब 2400 वर्ग फुट है। 32 हजार सालाना टैक्स के दायरे में आने के बावजूद आठ हजार से भी कम जलकर-गृहकर जमा होता है।
* केस तीन: कोतवाली के पीछे का एक भवन, तीन हजार वर्ग फुट 54 हजार टैक्स के दायरे में होने के बावजूद करीब 15 हजार रुपये जलकर-गृहकर जमा होता है।
* केस चार: हनुमान मंदिर स्थित एक कॉम्पलेक्स भवन 3200 वर्ग फुट में है। 56 हजार रुपये जलकर-गृहकर के सापेक्ष 17 हजार जमा होता है।
2500 वर्ग फीट आवासीय भवन पर 7400 रुपये टैक्स
चहेतों के कॉमर्शियल भवन पर नाम मात्र का टैक्स लेने वाली नगर पालिका ने दूसरों के आवासीय भवन पर बेतहाशा टैक्स ठोका है। न्यू कॉलोनी दक्षिणी निवासी गणेश मद्धेशिया का मामला इसकी नजीर हैं। गणेश के 2500 वर्ग फीट के आवासीय भवन पर 7480 रुपये वार्षिक जलकर और इतना ही गृहकर लगाया गया है। वर्ष 2012-13 से उन पर गृहकर-जलकर का बकाया दिखाते हुए 128656 रुपये की नोटिस दी गई है। गौर फरमाने वाली बात है कि इसी भवन पर वर्ष 06-07 में महज 140 रुपये का टैक्स लगा था। अब अचानक से 25 गुना वृद्धि के साथ सवा लाख रुपये बकाया की नोटिस पाकर उनका दिमाग चकरा गया है। प्रभावशालियों के सामने भीगी बिल्ली बने रहने वाले नगर पालिका कर्मी उन्हें चेतावनी दे रहे हैं कि अगर टैक्स जमा नहीं किया तो आरसी जारी कर दी जाएगी।
सख्ती हो तो छह करोड़ बढ़ सकती है पालिका की आय
नगर प्रशासन थोड़ी सख्ती दिखाए तो जलकर-गृहकर से पालिका की आमदनी चार गुणा बढ़ सकती है। वर्तमान में पालिका को इस मद से करीब दो करोड़ रुपये सालाना आय हो रही है। भवनों का सही मूल्यांकन होने के बाद छह करोड़ तक राजस्व में इजाफा हो सकता है।
जल्द ही सभी भवनों का सर्वे कराया जाएगा, जो मानक के अनुकूल कर नहीं दे रहे उन पर नया कर आरोपित किया जाएगा। आपत्ति होने पर लोग खुद कर निर्धारण कर सकते हैं। पालिका में ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू होने के बाद कर चोरी की समस्या स्वत: समाप्त होने लगेगी। इस पर भी काम चल रहा है।
- सत्यप्रकाश सिंह, ईओ नगर पालिका