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शुभ कर्मों में पितरों का पूजन सर्वाधिक महत्वपूर्ण

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‘शुभ कर्मों में पितरों का पूजन महत्वपूर्ण’
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संस्कृत महाविद्यालय बैकुंठपुर में चल रही कार्यशाला का तीसरा दिन
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। काशी के वेद परंपरा के विद्वान डॉ. मनोज मणि त्रिपाठी ने कहा कि वर्तमान कर्मकांड की परंपरा में आधुनिकता का समवेत प्रचलन कहीं न कहीं समाज व परंपरा के ऊपर आक्षेप कर रहा है। जिसका प्रभाव उस यज्ञ व अनुष्ठानकर्ता पर सीधा पड़ रहा है। नांदी श्राद्ध को वृद्धि श्राद्ध कहा जाता है। इसी कारण इसे शुभादि कर्मों में प्रयोग किया जाता है। किसी भी शुभादि कर्मों में पितरों का पूजन बहुत ही महत्व रखता है।
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वह शनिवार को श्री बैकुंठनाथ पवहारी संस्कृत महाविद्यालय बैकुंठपुर में ऋषि भारद्वाज ज्योतिषानुसंधान एवं जनकल्याण केंद्र की ओर से आयोजित 15 दिवसीय कार्यशाला में पंचांग पूजन विधि एवं कुशकंडिका प्रयोग विषय पर व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने कहा कि हम सभी को चाहिए कि इन पंचांग के अनुक्रमों का शास्त्रीय विधि से पालन करें जिससे इसका पूर्ण फल निश्चित ही हमें समयानुसार प्राप्त होगा। उन्होंने मुख्य रूप से धीरे-धीरे लुप्त होती हुई कुशकंडिका विधि और पंचांग पूजन के सांगोपांग सविधि क्रम में पुण्यावाचन, मातृकापूजन, आयुष्यमंत्र, जपनांदी श्राद्ध एवं आचार्य क्रम के बारे में छात्रों को बताया। इसके पूर्व स्वागत स्वागत भाषण कार्यक्रम संयोजक विवेक उपाध्याय, धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मनीष शुक्ल एवं संचालन डॉ. अजय शुक्ल ने किया। इस दौरान रानी चौरसिया, डॉ वंदना सिंह, प्रभा, रवि मधुसूदन चौरसिया, डॉ. नरेंद्र देव शुक्ल, डॉ. मदन मोहन पुरोहित, संजय पांडेय, पीयूष पांडेय, संपूर्णानंद शुक्ल, प्रद्युम्न दूबे, नीरज तिवारी, डॉ.मिथिलेश शुक्ल, संपूर्णानंद मिश्र, प्रवीण मिश्र, रविशंकर दुबे, साधना मिश्रा, कृष्णकांत मिश्र, राकेश तिवारी आदि उपस्थित रहे।
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