रुद्रपुर (देवरिया) । बाढ़ के पानी से घिरे दोआबा के 52 गांवों में पीड़ितों का दर्द कम होने के बजाय और बढ़ता जा रहा है। शताब्दी की भीषण बाढ़ झेल रहे लोगों को बंधों पर जलालत झेलनी पड़ रही है। नगवा, तिघरा मराछी, बेलवा, डढ़िया, भिरवा आदि बंधों पर शरण लिए बाढ़ पीड़ितों के पास ना तो सरकारी इमदाद है और ना ही आवागमन के साधन। यहां बाढ़ पीड़ित कंडे पर एक वक्त लिट्टी लगाकर तीन वक्त की भूख मिटा रहे हैं।
जल प्रलंय से दाने दाने को मोहताज बाढ़ पीड़ितों की मजबूरी का कुछ व्यापारी फायदा उठाने से भी परहेज नहीं कर रहे। बंधों पर शरण लिए पीड़ितों को निर्धारित मूल्य से अधिक दाम पर रसोई गैस का सिलेंडर बेच रहे। वहीं बाढ़ पीड़ित गेंहू के भंडारण को पानी के डूबने में डर से औने पौने दाम पर बेचने को मजबूर है। नगवा बंधे पर शरण लिए रामप्रित ने कहा कि वह छह दिन से बंधे पर परिवार लेकर जिंदगी काट रहे। कही से आटा मिलने पर लिट्टी, आचार, मिर्च से खाकर पेट की आग बुझा रहे है। महिला कौशल्या देवी ने कहा कि अब बच्चों की भूख देख बर्दाश्त नहीं हो रही। बंधे पर शरण लिए अन्य लोगों से वह कुछ आटा मांग कर ले आई। तावे से रोटी उतारते ही बच्चे सूखे ही रोटी खाने लगे। डढ़िया, भिरवा गांव के बंधे पर शरण लिए बाढ़ पीड़ित देंवती देवी, विद्यावती, शोभा की आंखे बात करते हुए डबडबा गई। उन्होंने कहा कि इमदाद तो दूर अब तक कोई हाल पूछने तक नहीं आया। बंधे से चारों तरफ सिर्फ पानी ही पानी दिख रहा। यदि यही हाल रहा तो बंधों पर शरण लिए परिवारों में भूखमरी शुरू हो जाएगी। रविवार की शाम गोर्रा और राप्ती नदी के जलस्तर में 15 सेमी की गिरावट दर्ज की गई। बावजूद इसके बाढ़ में डूबे गांवों में पानी कम नहीं हो रहा।