मुद्दों पर नहीं होती बात, बस साध रहे हैं जात
- सियासी रण में जातीय समीकरण साधने में जुटे हैं नेता
- मठाधीशों के जरिए अलग-अलग जाति के वोटरों को रिझाने की कोशिश
मनीष जायसवाल
देवरिया। सियासी रणबांकुड़ों के पास वोटरों को रिझाने के लिए मुद्दों की कमी नहीं है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, सिंचाई, चीनी मिल, उद्योग सहित तमाम मुद्दों पर जनता उनकी बात सुनने को बेकरार है, लेकिन चुनावी शोर में इन पर कोई बात नहीं हो रही। जीत सुनिश्चित करने के लिए नेताओं का सारा जोर जातीय समीकरण साधने पर है। मठाधीशों के जरिए वह जाति-बिरादरी के वोटरों पर डोरे डालने में जुटे हैं। स्टार प्रचारकों की डिमांड भी इसी तरह हो रही है, जिससे कि जाति विशेष के वोटरों को अपने पक्ष में मोड़ा जा सके।
जिले में सातवें चरण में 19 मई को मतदान होना है। इसके लिए नामांकन प्रक्रिया अंतिम चरण में है। प्रमुख दलों के उम्मीदवार नामांकन के बाद सियासी गोटियां फिट करने में जुट गए हैं। चुनावी जंग जीतने को कोई राष्ट्रवाद का राग अलाप रहा है तो कोई ‘न्याय’ का अस्त्र लेकर घूम रहा है। मगर इन चुनावी बातों से इतर उन्हें जाति रूपी ब्रह्मास्त्र पर सबसे ज्यादा भरोसा है। यही कारण है कि प्रचार अभियान के जोर पकड़ने के साथ ही जाति-बिरादरी के सम्मेलनों में तेजी आ गई है। तमाम ऐसे लोग सक्रिय हो गए हैं, जो खुद को बिरादरी का स्वयंभू मुखिया बता रहे हैं। कुर्सी के मोह में जकड़े नेताओं को भी चुनावी समर में जीत का झंडा गाड़ने के लिए जाति के चक्रव्यूह को तोड़ने में इन मठाधीशों का साथ रास आ रहा है। लिहाजा उनकी शरण में पहुंचने से गुरेज नहीं कर रहे। देवरिया-सलेमपुर के चुनावी माहौल पर गौर करें तो जीत-हार में यहां हमेशा से जातियों की गोलबंदी अहम भूमिका निभाती रही है। कभी ब्राह्मण, भूमिहार, वैश्य और अन्य पिछड़ी जातियों की एकजुटता कांग्रेस की जीत का आधार रही तो बाद में इन्हीं वोटों की बदौलत कमल खिला। राजपूत, यादव-मुस्लिम वोटों की गोलबंदी ने साइकिल को दिल्ली पहुंचाया तो वैश्य-दलित सहित अन्य वोटरों के सहयोग से हाथी ने भी मैदान मारने में कामयाबी पाई। कुशवाहा, राजभर, कुर्मी वोटरों का साथ भी जीत का आधार बनता रहा है। ऐसे में इस बार भी सभी दलों के नेता जातिगत समीकरणों को अपने अनुकूल करने में पूरा जोर लगा रहे हैं। हर बिरादरी के मठाधीश को अपने खेमे में लाकर वह गणना से पहले ही मैदान मारने की कवायद में हैं।