मानिकपुर (चित्रकूट)। करोड़ों की लागत से पाठा क्षेत्र के गांवों तक पेयजल पहुंचाने के लिए शुरू की गई नमामि गंगे योजना जमीनी स्तर पर दम तोड़ती नजर आ रही है। सरकारी दावों के बावजूद करीब 50 हजार की आबादी आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान है। भीषण गर्मी में ग्रामीण निजी बोरवेल, हैंडपंप और कुओं के सहारे प्यास बुझाने को मजबूर हैं।
पाठा क्षेत्र के 12 से अधिक गांवों में पानी की टंकियां बनाई गईं और पाइपलाइनें बिछाई गई हैं। इसके बाद भी अधिकांश गांवों में अब तक नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी। कई जगह करोड़ों की लागत से बनीं पानी की टंकियां केवल शोपीस बनकर खड़ी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि योजना के नाम पर गांवों की सड़कें और गलियां तो खोद दी गईं लेकिन घरों तक पानी नहीं पहुंचा।
स्थानीय निवासी श्याममूरत, दयाराम, महेश कुमार, राहुल सिंह और भरत लाल ने बताया कि सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च किए फिर भी हालात जस के तस बने हैं। बराहमाफी, करौहा-गोपीपुर, रामपुर कल्याणगढ़, ऐलहा-बढ़ेया और चुरेह कसेरूआ समेत कई गांव गंभीर पेयजल संकट से जूझ रहे हैं।
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पांच सौ मीटर दूर से ला रहे पानी
ऐलहा गांव निवासी रामलाल पयासी ने बताया कि गर्मी बढ़ने के साथ पानी की समस्या और विकराल हो गई है। गांव में बनी पानी की टंकी सिर्फ शोपीस बनकर रह गई है। उन्हें घर से करीब पांच सौ मीटर दूर लगे बोरवेल से पानी लाना पड़ता है। इससे काफी समय बर्बाद होता है।
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हैंडपंपों में लग रही लंबी लाइनें
बराहमाफी निवासी अंबिका प्रसाद ने बताया कि पानी के लिए हैंडपंपों पर घंटों इंतजार करना पड़ता है। कई बार लाइन को लेकर ग्रामीणों के बीच विवाद की स्थिति भी बन जाती है। शिकायत के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हो सका है।
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डेढ़ किलोमीटर दूर से ढोना पड़ रहा पानी
इटवा और डुडैला के जगन्नाथपुरम गांव में स्थिति और गंभीर है। यहां अब तक पेयजल आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी है। ग्रामीणों को एक से डेढ़ किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है। लोगों का कहना है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं लेकिन बाद में गांवों की कोई सुध नहीं ली जाती।
गांवों में पेयजल व्यवस्था की लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। कहीं कोई अव्यवस्था है तो उसे दिखवाकर जल्द सुधार कराया जाएगा।
- स्वप्निल यादव, एडीएम नमामि गंगे।
फोटो 23 सीकेटीपी-13- सरहट में बनी पानी टंकी। संवाद