चित्रकूट। यह धरती सिर्फ राम के 11 साल के वनवास की नहीं, बल्कि आजादी की अलख जगाने वाली भी है। महात्मा गांधी ने यहां अंग्रेजी राज के खिलाफ लोगों को जगाया था। मानिकपुर जंक्शन ब्रिटिश काल में उत्तर-मध्य भारत का अहम पड़ाव था।
गांधीजी की ट्रेन कोलकाता, मुंबई और गुजरात की यात्रा में यहीं रुकती थी। ट्रेन बदलने के 15-20 मिनट में ही कर्वी, मानिकपुर और मऊ के लोग प्लेटफार्म पर जुट जाते थे। बापू वहीं खड़े-खड़े स्वदेशी, स्वच्छता और अहिंसा का मंत्र देते थे। 1930 में बांदा जाते समय गांधीजी कर्वी में करीब तीन घंटे रुके थे। उन्होंने डाक बंगले और गांधी हरिजन विद्यालय के पास दो सभाएं कीं। बापू ने विदेशी वस्तुओं को छोड़ने, चरखा अपनाने और आजादी करीब होने का संदेश दिया। चित्रकूट के लोगों ने चंदा इकट्ठा कर गांधीजी को सौंपा था। लक्ष्मी प्रसाद मिश्र और राम बहोरी करवरिया गांधीजी के करीबी माने जाते थे।
हात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय इस विरासत को सहेजे हुए है। राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख ने 12 फरवरी 1991 को ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। 1994 में गांधीजी की 125वीं जयंती पर इसका नाम बदला गया। परिसर में बापू की विशाल प्रतिमा लगी है। गांधी विचार केंद्र में उनके संस्मरण, चिट्ठियां और आंदोलन की तस्वीरें आज भी सुरक्षित हैं। ये नई पीढ़ी को राम के वनवास से गांधी के स्वराज तक की यात्रा याद दिलाती हैं।