मकर संक्रांति पर्व पर भरतकूप श्रद्धा का केंद्र रहता है। यहां हजारों श्रद्धालु आते हैं और स्नान कर पुण्य लाभ कमाते हैं। यहां लगने वाले मेले में खरीदारी भी करते हैं।
लेकिन प्रशासन की उदासीनता के चलते यहां तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं है। प्रकाश और पेयजल की व्यवस्था न होने से परेशानी होती है।
मान्यता है कि भगवान राम के वनवास के दौरान उनके भाई भरत अयोध्या से उनको मनाने और राज्याभिषेक के लिए लेने चित्रकूट आए थे। वह रास्ते से सभी तीर्थों का जल लेकर आए थे।
जब भगवान राम ने उनके साथ जाने से मना कर दिया तो भरत ने चित्रकूट से लौटते समय भरतकूप में सारा जल डाल दिया था। भरत ने अत्रि मुनि के आदेश पर ऐसा किया था।
लोगों का कहना है कि भरतकूप का जल इतना शुद्ध है कि इसमें कीड़े नहीं पड़ते। इसके कारण ही ये लोगों की आस्था का केंद्र है। जिला मुख्यालय से लगभग पंद्रह किमी दूर स्थित इस पवित्र स्थान पर शासन और प्रशासन के ध्यान न देने से लोगों में नाराजगी है।
इन सुविधाओं का इंतजार
कूप के आसपास प्रकाश की व्यवस्था नहीं। मुख्य ट्रेनों का ठहराव भी यहां नही है। गौरतलब है कि हर अमावस्या में चित्रकूट आने वाले भक्त भरतकूप स्टेशन पर ही उतरते हैं।
यहां स्नान करने और जल लेने के बाद ही चित्रकूट जाते हैं। भरतकूप से खोही, रामशय्या होकर पैदल चित्रकूट जाने का रास्ता है। लेकिन हाल ये है कि कसबे में तिराहे में लगी स्ट्रीट लाइट जलती नहीं है। पेयजल और ठहराव की व्यवस्था न होने से लोग परेशान होते हैं।
गांव के शशि शेखर मिश्र, रामशिरोमणि दुबे, राजीव यादव, तेज नारायण यादव, कल्लूराम गुप्ता, सूरसेन सिंह, मइयादीन यादव आदि लोगों ने भरतकूप में सुविधाओं की मांग की है।
रामचरित मानस में उल्लेख
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा, अति पावन तीरथ जल जोगा।
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी, होहिहहिं विमल करम बन बानी।।
दुकानदारों पर पड़ती दोहरी मार
लोगों का कहना है कि पहले लगभग एक सप्ताह तक भरतकूप में मेला लगता था। राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर इस मेले में दूरदराज से दुकानदार आते थे।
धीरे-धीरे मंदिर के आसपास के इलाके में मकान बनते गए और दुकानदारों की संख्या घटनी शुरू हो गई। दुकानदारों का कहना है कि उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ती है।
जिसके दरवाजे पर दुकान लगाओ उसे भी पैसा दो और जिला पंचायत को भी किराया दो। पहले यहां दो से ढाई हजार तक दुकानें लगती थीं लेकिन अब इनकी संख्या घटकर करीब पांच सौ के आसपास रह गई है।