चित्रकूट। आजादी की लड़ाई में जगदीश करवरिया ने भी अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे। वह अपने गुरु लक्ष्मीनारायण अग्निहोत्री के कहने पर खेतीबाड़ी छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। उन्हें तीन बार जेल की सजा मिली लेकिन हौसला नहीं टूटने दिया।
कर्वी तरौंहा में रहने वाले जगदीश करवरिया खेतीबाड़ी कर परिवार का पालन करते थे। आजादी की लड़ाई गांव-गांव पहुंची तो वह भी तैयार हो गए। गुरु लक्ष्मीनारायण अग्निहोत्री ने आशीर्वाद दिया तो सबकुछ छोड़कर अंग्रेजों के खिलाफ मैदान में आ गए। अंग्रेजों से कई बार सामना हुआ। पीछे नहीं हटे। बराबर का मोर्चा लिया। तीन बार सजा हुई। जेल जाना पड़ा। एक बार गोरखपुर जिले में तीन माह से अधिक समय तक बंद रहे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जगदीश करवरिया के एक बेटे जवाहर लाल तरौंहा में रहते हैं। इनके चार पुत्र आत्माराम, कौशल किशोर,नंद किशोर व जितेंद्र करवरिया हैं। नंद किशोर परिषदीय स्कूल में शिक्षक हैं। बाकी खेती करते हैं। नंद किशोर ने बताया कि बाबा ने गांधीवादी नीति से आजादी के लिए अलख जगाई थी। बाबा साहित्यकार भी थे। वह कविताएं और कहानियां लिखा करते थे। कवि सम्मेलनों में भी भाग लेते थे। आजादी के लिए अपने गुरु लक्ष्मीकांत अग्निहोत्री के साथ काम किया। उनसे प्रभावित होकर तरौंहा इलाके के कई युवक आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए थे। बाबा का निधन 20 मार्च 1989 में हुआ था।
मिट रहे स्तंभ पर दर्ज स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद में नगर पालिका कार्यालय के पास पत्थर का स्तंभ लगा है। इस पर इनके नाम और पता दर्ज है। देखभाल न होने से सेनानियों के नाम मिटने लगे हैं। सफाई न होने से गंदगी जमा हो गई है। बुंदेली सेना के जिलाध्यक्ष अजीत सिंह, व्यापारी नेता पंकज अग्रवाल, शानू गुप्ता, रामबाबू गुप्ता आदि का कहना है कि बडे़ से स्तंभ पर जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नाम लिखकर सुरक्षा के इंतजाम किए जाएं।
देश की आजादी में तरौंहा का बड़ा योगदान
शहर से लगी मंदाकिनी नदी के किनारे बसा है तरौंहा मोहल्ला। आजादी की लड़ाई में यहां केे लोगों का बड़ा योगदान रहा। यहां के आधा दर्जन युवकों ने गांधीवादी नीति से अंग्रेजों से संघर्ष किया। तरौंहा मोहल्ले के जगदीश प्रसाद, करवरिया, मुरलीधर करवरिया, राजकिशोर, जगन्नाथ प्रसाद, मुरलीधर को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा मिला था।