चित्रकूट। मुझे तमंचा चलाना नहीं आता जब मैंने साथी किशोर से कहा तो उसने कहा ऐसे पकड़ो और फिर ऐसे चलाया जाता है... यही वह सिखा रहा था धोखे से जब वह तमंचे को उसके चेहरे के पास ले गया तो उसने बताया कि किसी को गोली मारी जाती है तो ट्रिगर दबाना पड़ता है। इसी बीच ट्रिगर दब गया और घटना हो गई। यह बात सहमे हुए किशोर ने पुलिस को बताई।
बहिलपुरवा थाना क्षेत्र के एक गांव में घर के अंदर खेल-खेल में गोली चलने से किशोर के मौत के मामले में शनिवार को आरोपी किशोर से पुलिस ने पूछताछ की। पहले तो किशोर ने बताया कि बाक्स में चूहा मरा था।
उसे निकाल रहा था और फिर परिचित किशोर तमंचा निकालकर देखने लगा तभी धमाका हुआ तो वह डर कर भाग गया। इसके बाद उसने बताया कि वह खुद मृतक से तमंचा चलाना सीख रहा था इसी बीच फायर हो गया।
इस मामले में उसके पिता की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज की गई है। किशोर अपने करीबी परिचित के यहां मां के साथ जल बिहार मेला देखने आया था। शनिवार को उसका अंतिम संस्कार किया गया। इसमें दोनों गांवों के लोग शामिल हुए।
गांव निवासी ने बताया कि उसका बेटा व उसकी पत्नी, उसके रिश्तेदार के घर जल बिहार कार्यक्रम व मेला देखने गुरुवार को गई थी। शुक्रवार की सुबह करीब नौ बजे दोनों किशोर कमरे में गद्दे रख रहे थे। तभी खेल-खेल में गोली चल गई थी। इसमें उसके बेटे के सिर में गोली लग गई थी। अस्पताल पहुंचने के पहले ही उसकी मौत हो गई थी।
सूचना पर एसपी, सीओ सहित अन्य थाना पुलिस मौके पर पहुंची थी। दिन भर पुलिस घटना के संबंध में साक्ष्य जुटाती रही। परिजन भी पूछताछ में कोई सही जानकारी नहीं दे रहे थे। देर शाम पुलिस ने कडाई से पूछताछ की तो पूरी सच्चाई बताई। इसके बाद पुलिस ने किशोर के पिता की तहरीर पर बीएनएस 106 के तहत रिपोर्ट दर्ज की।
इसमें बताया कि उसका बेटा तमंचा दिखा रहा था, थोड़ी सी लापरवाही या जल्दबाजी के कारण गोली चल गई और बेटे की मौत हो गई। शुक्रवार की रात को पोस्टमार्टम के बाद शव गांव पहुंचा तो परिजनों में चीख पुकार मच गई। गमगीन माहौल में अंतिम संस्कार किया गया।
अंतिम संस्कार में दोनों गांवों के लोग शामिल हुए। सीओ अरविंद कुमार वर्मा ने बताया कि मृतक के पिता की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज की गई है।
मृतक के पिता गांव में घर में ही छोटी परचून की दुकान संचालित करते हैं। उनके अब एक पुत्र व दो पुत्रियां बची हैं। जिसमें मृतक बेटा दूसरे नंबर का था। मां यह कह कर रो रही थी कि मेला देखने न आते तो यह घटना न होती। बेटे की जान तो बच जाती। पिता ने यह भी बताया कि छोटा पुत्र भी मेला में आने की जिद कर रहा था लेकिन उसे एक दिन बाद खुद ले जाने की बात कहकर समझाया था। बड़ा बेटा कक्षा सात में पढ़ता था। मेला खत्म होने के बाद पांच सितंबर को स्कूलों में अवकाश होने के कारण उसकी मां बेटे के साथ गांव में रुक गई थी। देर शाम तक दोनों को वापस लौटना था, लेकिन इससे पहले ही घटना हो गई।