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Chitrakoot News: ट्रेन में हिरासत से बंदी के फरार होने पर सिपाही की बर्खास्तगी रद्द

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-कोर्ट ने कहा-तथ्यों से लापरवाही विश्वसनीय रूप से साबित नहीं होती
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चित्रकूट के सिपाही राम गोपाल की ओर से दाखिल याचिकाएं निस्तारित
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रेन से हथकड़ी लगे विचाराधीन बंदी के फरार होने के मामले में सिपाही की बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया। हालांकि, उसे उस अवधि का वेतन नहीं मिलेगा जिसमें उसने काम नहीं किया।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा, न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने राज्य सरकार और चित्रकूट के राम गोपाल की ओर से दाखिल दोनों याचिकाओं को निस्तारित करते हुए दिया है। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से सिपाही की लापरवाही विश्वसनीय रूप से साबित नहीं होती। हालांकि, वह पूरी तरह सतर्क नहीं था।
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मामला वर्ष 2005 का है। राम गोपाल पुलिस बल में सिपाही के रूप में तैनात था। एक विचाराधीन बंदी को फास्ट ट्रैक कोर्ट में पेश करने के बाद ट्रेन से जेल वापस ले जा रहा था। 15 सितंबर की रात डभौरा रेलवे स्टेशन से ट्रेन रवाना होते समय बंदी ने शौच जाने की इच्छा जताई। सिपाही राम गोपाल उसे हथकड़ी और रस्सी से बांधकर शौचालय की ओर ले गया। इसी दौरान बंदी ने उसे धक्का देकर रस्सी छुड़ा ली। चलती ट्रेन से प्लेटफॉर्म नंबर दो पर कूदकर फरार हो गया।

विभागीय जांच में सिपाही को लापरवाही का दोषी मानते हुए तीन जनवरी 2019 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। स्टेट ट्रिब्यूनल ने बाद में बर्खास्तगी अनुपातहीन मानते हुए रद्द कर दी। सेवानिवृत्ति लाभों के लिए सेवा संबंध काल्पनिक लाभ (नोशनल बेनिफिट) देने का निर्देश दिया था।
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इस आदेश को राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया। कहा कि सिपाही के आचरण से यह स्पष्ट है कि उसने चेन खींची, ट्रेन रुकवाई, बंदी की तलाश की और स्टेशन मास्टर को सूचना दी। इसलिए बर्खास्तगी उचित नहीं है। हालांकि, उसे उस अवधि का वेतन नहीं मिलेगा, जिसमें उसने काम नहीं किया। लिहाजा, कोर्ट ने तीन महीने में ट्रिब्यूनल के आदेश का अनुपालन करने का आदेश दिया है।
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