चित्रकूट। भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट में कभी तीन नदियों का संगम हुआ करता था।
कामदगिरि पर्वत से निकलने वाली पयस्वनी व सरयू की धाराएं मंदाकिनी में समाहित होकर राघव प्रयाग घाट पर त्रिवेणी जैसा संगम बनाती थीं। आज वही नदियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं।
कहीं नदी का रास्ता मकानों व दुकानों के नीचे दब गया तो कहीं उसमें कचरा और गंदा पानी बह रहा है। जिन धाराओं में कभी श्रद्धालु स्नान करते थे, वह अब नाले का रूप ले चुकी हैं।
स्थानीय बुजुर्गों व धार्मिक परंपराओं के अनुसार करीब चार दशक पहले तक इन दोनों नदियों का प्रवाह स्पष्ट दिखाई देता था। वर्ष 1980 के आसपास तक लोग इनके बहाव के साक्षी रहे हैं। समय के साथ अतिक्रमण, सिल्ट जमा होने और जलनिकासी के बदलते स्वरूप ने इन नदियों का प्राकृतिक रास्ता रोक दिया।
धार्मिक व भौगोलिक रूप से कामदगिरि पर्वत का विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार इसी पर्वत क्षेत्र से दोनों जलधाराएं निकलती थीं। कामदगिरि के दक्षिणी हिस्से में स्थित ब्रह्मकुंड से पयस्वनी की धारा निकलती थी। दूसरी ओर पर्वत के पश्चिमी हिस्से से सरयू की धारा का प्रवाह रहा है।
पयस्वनी आगे बढ़ते हुए ब्रह्मकुंड क्षेत्र से होकर निकलती और लगभग तीन किलोमीटर के प्रवाह के बाद सरयू की धारा से जुड़ती थी। इसके बाद दोनों धाराएं मंदाकिनी की ओर बढ़ती थीं।
सरयू की धारा सरयू कुंड क्षेत्र में कुछ दूरी के लिए विलुप्त होकर चित्रा गोकुलपुर क्षेत्र से फिर दिखाई देती थी। पुरानी लंका के आसपास पयस्वनी और सरयू का मिलन होता था। आगे चलकर दोनों धाराएं राघव प्रयाग घाट पर मंदाकिनी में मिलती थीं। इस तरह यहां तीन नदियों का संगम माना जाता था, जो अब इतिहास बन गया है।