जिले की राजनीति के हिसाब से भाजपा ने आखिरकार जातीय कार्ड ही खेलकर बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को चुनौती दी है। भाजपा ने पिछले चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे प्रत्याशी पर दांव लगाकर कई दिनों से चल रही असमंजस की स्थिति को भी समाप्त कर दिया है। पहले माना जा रहा था कि बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए पूर्व मंत्री आरके पटेल अथवा उनके पुत्र सुनील पटेल को भाजपा मैदान में उतार सकती है। वहीं सपा व कांग्रेस के गठबंधन का खेमा तो जातीय राजनीति में खुद को सबसे आगे मान रहा है।
रविवार की शाम को भाजपा व सपा की अंतिम सूची जारी होने के बाद अब क्षेत्रवासी किसको कहां कैसे फायदा होगा, इसकी गणित लगाने लगे हैं। क्षेत्रीय राजनीति और मुद्दों में जातीय आंकडे़ प्रमुख रहते हैं ऐसे में लोग मंथन में लगे हैं कि आखिकार भाजपा, सपा, बसपा ने किस आधार पर यहां से प्रत्याशी उतारा है।
लोगों का मानना है कि भाजपा ने ब्राह्मण कार्ड खेला है तो सपा ने पुराने प्रत्याशी पर फिर से दांव लगाया है जबकि बसपा ने सोशल इंजीनियर के तहत ब्राह्मण प्रत्याशी को उतारा है। कई दिनों से भाजपा का प्रत्याशी घोषित न होने से लोग कई तरह के कायस लगा रहे थे।
बीच में उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री आर के सिंह पटेल के भाजपा में शामिल होने पर कयास लगा जा रहा थ कि इस बार भाजपा पिछडे़ वर्ग से पार्टी अपना प्रत्याशी उतर सकती है। जिससे समीकरण इस बार दूसरे होंगे लेकिन इस बार पार्टी ने फिर से जब भाजपा ने ब्राह्मण वर्ग से प्रत्याशी उतारा तो लोगों के तर्क बदल गये। अधिकतर लोग मान रहे है कि इस बार भाजपा, सपा, बसपा में कड़ी टक्कर होगी।