फोटो 29 सीकेटीपी-09-अरवारा केंद्र में तैयार एजोला की खेती।
चित्रकूट। धान की खेती में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए अब किसान एजोला का सहारा ले रहे हैं। पानी की सतह पर उगने वाला एजोला एक जलीय फर्न (पत्तीदार काई) है। इसे प्राकृतिक उर्वरक माना जाता है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक यह धान की फसल में जैविक खाद के रूप में काम करता है और उत्पादन बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है।
कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) चित्रकूट में धान की खेती में रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग को कम करने के उद्देश्य से बड़े स्तर पर एजोला उत्पादन किया जा रहा है। केंद्र में पांच एकड़ क्षेत्र में धान उत्पादन के लिए करीब 10 क्विंटल एजोला तैयार किया जा रहा है। एजोला की पत्तियों में एनाबिना नामक नील-हरित शैवाल पाया जाता है। यह वातावरण से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में मिलाता है। इससे धान की फसल को प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन मिलती है और पैदावार बढ़ती है।
वैज्ञानिक राजेंद्र सिंह नेगी ने बताया कि धान की रोपाई के सात से 10 दिन बाद प्रति एकड़ करीब दो क्विंटल एजोला खेत में डालने पर यह एक महीने के भीतर पूरे खेत में फैल जाता है। इससे फसल को लगातार पोषण मिलता रहता है। एजोला के उपयोग से धान की खेती में रासायनिक उर्वरकों की जरूरत 25 से 30 प्रतिशत तक कम की जा सकती है।