चित्रकूट। दिल्ली से फरार आरोपी को पकड़ने आए दारोगा की गोली मार कर हत्या कर दी गई। बीती रात दबिश के दौरान आरोपी के गांव छोटी बिलहरी में ही दिल्ली पुलिस की टीम पर हमला कर दारोगा को दो गोलियां मारी गईं। इस संबंध में एसपी केबी सिंह ने बताया कि दिल्ली से आए सिपाही गौरीशेखर की तरफ से फूलचंद्र, प्रेमचंद्र, रमेश यादव और एक अन्य रमेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। रमेश यादव और रमेश से पुलिस पूछताछ कर रही है। बाकी दोनों आरोपियो ंकी तलाश में आधा दर्जन टीमें जगह जगह दबिश दे रही हैं। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर देवांगना पहाड़ी पर बसे छोटी बिलहरी गांव में रात में जाना दुष्कर है। उस पर बिना पुलिस को सूचना दिए किसी दबिश में जाना मौत के मुंह में सिर देने के बराबर है। दुखद यह कि दिल्ली पुलिस के दो कर्मियों ने यह गलती की और उसका खामियाजा भुगतना पड़ा कि जो सब इंस्पेक्टर कल जीवित यहां आया था, उसकी मृत देह वापस जा सकी।
सोनेपुर गांव के पास जिला चिकित्सालय, कलेक्ट्रेट आदि के नवीन भवनों के होने के बाद भी आगे के गांवों में विकास नजर नहीं आता। दस्युओं का खतरा है सो अलग। बरुई, नयापुरवा, ददरी आदि गांवों में पीएसी भी कैंप लगाए है। इसके बाद भी यहां डाकुओं का खतरा कम नहीं होता। लखनपुर में हाल ही में बलखड़िया ने दो युवकों को मुखबिरी के शक में गोलियों से उड़ा दिया था। बरुई बलखड़िया का गांव है और गांव में सड़क से ही उसका उजाड़ घर नजर आता है। इसी रास्ते में आगे जाने पर गिरधारी बाबा का जंगल है। ददरी माफी में रिपोर्टिंग पुलिस चौकी भी है। कैलहा गांव से मुड़ने के बाद पहले बड़ी बिलहरी और कुछ ही दूरी पर बगल से छोटी बिलहरी है। ददरी गांव पंचायत के इसी छोटी बिलहरी मजरे में गुरुवार की रात दिल्ली के बेगमपुरवा चौकी के सब इंस्पेक्टर जयबहादुर शर्मा की हत्या हो गई। घटना के बाद से यहां पर ददरी चौकी के प्रभारी इंद्रबहादुर सिंंह गांव में मौजूद हैं। उनके साथ लगभग आठ सिपाही और पीएसी की आधी बटालियन भी मुस्तैद थी। इंद्रबहादुर ने बताया कि दिल्ली से आए पुलिसकर्मियों की गलती यह थी कि इन लोगों ने स्थानीय पुलिस को सूचना नहीं दी। पास में बहिलपुरवा थाना था न तो वहां पर बताया गया और न रास्ते में रिपोर्टिंग चौकी पड़ती थी वहां पर कोई सूचना दी गई। गौरतलब है कि यहां पर तेंदू पत्ता तुड़ान का मौसम होने से आए दिन बलखड़िया के गांवों के आसपास होने की सूचना भी मिलती रहती है, ऐसे में जाहिर है कि दिल्ली पुलिस के अफसरों से यहां दस्यु प्रभावित इलाके में दबिश देने में रात का समय चुनने और उस पर स्थानीय पुलिस को सूचना न देना एक बड़ी गलती का सबब बन गया।
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... तो बलखड़िया गिरोह का काम नहीं
मौके पर जाने से एक बात तो साफ होती है कि जिस तरह से वारदात को अंजाम दिया गया और सब कुछ एक फिल्मी सीन की तरह होता चला गया वह महज संयोग नहीं था। घटना के दौरान मौजूद रहे देवराज यादव पुत्र उद्धव यादव ने बताया कि लगभग साढ़े सात-आठ बजे का समय रहा होगा। उसने बताया, साब, मैं मनेशी (मवेशी) बांधत रह्यों, के सामने से जीप आई। दूसर तरफ से आठ-दस आदमी भी तबहिन आ गए। उसने बताया कि इनमें से एक ने पुलिसवालों से हाथ उठाने को कहा, एक ने तो हाथ उठा दिए पर दूसरे ने नहीं उठाए। जो आगे चल रहा था उसने जैसे ही हाथ उठाए बदमाशों ने लगभग दस कदम की दूरी से उस पर तमंचे से गोली दाग दी। देवराज के बताए अनुसार और गांव में चर्चा पर विश्वास किया जाए तो बलखड़िया गिरोह का यह काम इसलिए नहीं हो सकता कि बलखड़िया वहां लंबे अरसे से नहीं आया और अगर आता भी है तो कोई वारदात नहीं करता। उसके पास असलहे भी घातक हैं। चर्चा यह थी कि गांव निवासी और काफी समय पहले तक खड़ग सिंह के गिरोह में रहा गौरी यादव यह वारदात कर सकता है। इस बात को वजन इस बात से भी मिलता है कि गांव के प्रेमचंद्र यादव का परिवार भी संदेह के घेरे में रहा है और हो सकता है कि पुलिस के आने की सूचना प्रेमचंद्र ने गौरी को दे दी हो और गौरी ऐन समय पर वहां पहुंच गया हो। बताया जाता है कि प्रेम चंद्र का एक भाई फूलचंद्र आपराधिक किस्म का है और उसकी एक बार पीएसी कैंप में मारपीट हुई थी, जब वह भाग निकला था। इस मामले के बाद से वह फरार है और पुलिस का शक उस पर भी है। आखिर एक ही समय पर पुलिसकर्मियों और बदमाशों का वहां पहुंचना महज संयोग तो नहीं ही हो सकता।
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घर में सिटकनी, घरवाले नदारत
छोटी बिलहरी गांव पूरी तरह से यादवों का पुरवा कहा जा सकता है। वारदात के बाद से यहां सन्नाटा है। जब वहां पहुंचे तो लोगों ने डरकर अपने दरवाजे बंद कर लिए। कोई कुछ बताने, बोलने को तैयार नहीं। आखिरकार पुलिस वालों से कहकर देवराज को बुलाया गया, जिसने डरते डरते सारी दास्तां बताई। आलम यह था कि देवराज ने जानकारी देते देते कम से कम चार बार पैर छू लिए, डर इतना ज्यादा था। अंदर प्रेमचंद्र के कच्चे घर पर बाहर से सिटकनी लगी थी। इसी से सटी दीवार का सहारा ले बने दूसरे घर के बाहर बैठी बूढ़ी महिला सुकरिया और उसकी नातिन रानी ने बताया कि प्रेमचंद्र का पूरा परिवार अनुसूइया (सती अनुसुइया, सीतापुर) में रहता है। उनसे हमारा कोई लेना देना नहीं। हमसे मतलब नहीं कोई रिश्ता नहीं। सुकरिया ने बताया कि ये लोग जब कभी आते हैं तो हम लोगों से बोलते भी नहीं। यही बात आस-पास रहने वाले पप्पू, मनीष, कल्याण आदि ने भी कही। हां, यह जरूर बताया कि त्रिमोहन के फूलचंद्र, भोला, प्रेमचंद्र और अर्जुन कुल चार पुत्र हैं। सभी की शादी हो चुकी है। इन लोगों ने यह भी बताया कि ये लोग खुद को अनुसुइयाजी में रहने की बात बताते हैं अब ये कहां रहते हैं भगवान जाने। घर में केवल इनकी विधवा मां चुनबादी रहती है। जब वहां पहुंचे तो वह भी नहीं मिली।
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... तो निजी वाहन से आए थे दबिश देने
चित्रकूट। दिल्ली से पुलिसकर्मी यहां प्रेमचंद्र को पकड़ने जिस वाहन से आए थे, उसके पीछे एक समाचार पत्र का नाम है। लोग बताते हैं कि यह वाहन दो दिन से यहां देखा भी जा रहा था। बताया जाता है कि दिल्ली निवासी वेदप्रकाश और उनका परिवार तीर्थक्षेत्र के अनुसुइया आश्रम में लंबे अरसे से आता रहा है और यहीं के महंत के कहने पर उन्होंने छह साल पहले रमेश को नौकरी पर रखा था। रमेश और प्रेम का परिवार अब गांव में नहीं रहता और इनके परिजनों की अनुसुइया आश्रम के आसपास प्रसाद की दुकानें बताई जाती हैं। यही वजह रही कि सेठ के साथ आई पुलिस पहले गांव न जाकर अनुसुइया आश्रम से ही टोह लेती रही। ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि किसी ने गांव में छिपे प्रेमचंद्र को बता दिया हो और उसने बाद की पटकथा पहले से लिख रखी हो। पुलिसकर्मियों के पास पर्याप्त हथियार न होना भी इस दुखद घटना की एक वजह बन गया। बताया गया कि जयबहादुर के पास एक नौ एमएम पिस्टल ही थी। साथ ही सिर्फ एक सिपाही के साथ आना भी गलत साबित हुआ।