कंदवा। गलत कर्मों का नतीजा भी गलत ही होता है। जैसे गोकर्ण भागवत भक्त थे और उनका अधर्मी भाई धुंधकारी वेश्याओं के साथ रमण करता था। अंत में वेश्याओं ने उसका सब कुछ लूट कर उसकी हत्या कर दी। अकाल मृत्यु होने के कारण धुंधकारी प्रेत योनि में गया। गोकर्ण ने भाई को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए सूर्य भगवान के बताए सूत्र पर श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया और भाई धुंधकारी को कथा सुनाई। कथा श्रवण से धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई। इससे स्पष्ट है कि आखिर में भाई ही भाई के काम आता है। यह बातें चिरईगांव में चल रहे चातुर्मास यज्ञ में बुधवार को त्रिदंडी स्वामी के शिष्य सुंदर राजमहाराज ने कहीं। उन्होंने आत्मदेव ब्राह्मण की कथा सुनाते हुए श्रीमद्भागवत महापुराण के महत्व को बताया। कहा कि आत्मदेव के दो पुत्र गोकर्ण और धुंधकारी थे जिनमें गोकर्ण भगवान का सच्चा भक्त और धुंधकारी अधर्मी और पातकी कर्म में लिप्त था। धुंधकारी ने वेश्याओं पर सब कुछ लुटा दिया था। अंत में वेश्याओं ने उसे मार दिया जिससे वह प्रेत योनि में चला गया। भाई गोकर्ण ने सूर्य की आराधना की तो उन्होंने मुक्ति के लिए धुंधकारी को श्रीमद्भागवत महापुराण सुनाने को कहा। गोकर्ण ने श्रीमद्भागवत महापुराण का प्रतिष्ठान किया और धुंधकारी की प्रेत आत्मा का आह्वान कर उसे पुराण सुनाया। इससे उसके आत्मा की मुक्ति हुई और वह बैकुंठ गया। कहा कि मनुष्य को उचित कर्म और धर्म करने चाहिए। श्रीमद्भागवत महापुराण के नियमित संयम पूर्वक सुनने से जीव को सुख, शांति और अंत में मुक्ति प्राप्त होती है। इस मौके पर आकांक्षा सिंह, निष्ठा सिंह, सोनाली, रीता, कमला, उदय प्रताप सिंह, मृत्युंजय सिंह, आत्मप्रकाश पांडेय, योगेंद्र सिंह, रामानंद यादव रहे।