पुरुषार्थ का त्याग नहीं करना चाहिए, यदि पुरुषार्थ करना पड़े तो वह लोक कल्याणकारी होना चाहिए।
गलत
कार्यों के लिए किया गया पुरुषार्थ सार्थक व फलदायी नहीं होता। क्योंकि
संस्कार विहीन व्यक्ति शव के समान होता है। यह उद्गार कस्बा स्थित इंटर
कालेज के खेल मैदान में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन लक्ष्मी
प्रपन्न जीयर स्वामी जी ने भक्तों से कहीं।
उन्होने व्यास की कथा
सुनाते कहा कि नारद जी द्वारा बताये गये कल्याणकारी एंव जनहित में रचना
करने की बात पर सोचनीय मुद्रा में बैठे थे।
उसी वक्त गणेश जी व्यास जी के
पास पहुंचकर उदासी का करण पूछते हैं। व्यास जी ने गणेश जी को एक रचना करने
दूसरे पुत्र प्राप्ति करने की बात बताई गणेश जी रचना लिखने का दायित्व
संभालने की बात कही।
इससे दोनो लोग मिलकर श्रीमद्भागवत की रचना की।
उन्होनें कहा कि मनुष्य 15 प्रकार से निष्क्रिय होते अर्थात मरे हुए होता
है । मरा हुआ , रोग ग्रसित, केवल अपने ही आप में रचा बसा रहना , अधिकार
मर्यादा समाज का ख्याल न करना, संस्कार व संस्कृति विहिन व्यक्ति इसी 15
प्रकार के उदाहरणों सहित लोगो को समझाया।
उपस्थित भक्तों को प्रेरणा देते
हुए कहा कि सर्वप्रथम पृथ्वी को प्रणाम करना चाहिए। सारे सृष्टि गुण व
अवगुण सदाचार कदाचार को समटते हुए सबका भार सहते हुए मॉ के समान जीव को
संरक्षण देती है।
पृथ्वी भगवान विष्णू की पत्नी है इसलिए वह मेरी मां है ।
वही स्रोताअेां को श्री मद्भागवत की रचना करते समय व्यास जी से एक शर्त रखी
कि धारा प्रवाह बोलते रहिए, बिना विराम के तब तो मै लिखूंगा।
इस बात पर
व्यास सेाच में पड़ गये लेकिन उन्होने ने भी विवेक का प्रयेाग कर एक शर्त
रखी जो मै बोलूगा बिना उसके अर्थ के समझे आप नही लिखेगे।
इस तरह
श्रीमद्भागवत की रचना की जो इस कलियुग मनुष्य के सभी पापो को नाश करने का
प्रमुख ग्रन्थ बना । इस मौके पर डा. विनोद यादव, खंडवारी प्रधान भजुराम
चौहान, अशोक मिश्र, जयप्रकाश यादव, राजेन्द्र पांडेय, छेदी सिंह, दीपक सिंह
आदि रहे।