कंदवा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जंग-ए-आजादी का जोश ऐसा था कि बच्चा-बच्चा अंग्रेजों के खिलाफ उतर गया था। बरहनी ब्लॉक के अमड़ा गांव निवासी बाबू रामनरेश सिंह 1931 में मात्र 12 साल की उम्र में ही अंग्रेजों से भिड़ गए थे। कवरुवा और अमड़ा में अंग्रेजों के सामने भाषण और सत्याग्रह शुरू कर दिया था। पहले तो अंग्रेजों ने उन्हें डांट डपट कर चुप कराना चाहा लेकिन जब वे नहीं माने तो उन्हें छह बेंतों की सजा दी थी।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू रामनरेश सिंह का जन्म 1919 में अमड़ा गांव में हुआ था। तब यह गांव अविभाजित वाराणसी जनपद में था। वह मात्र 12 वर्ष की आयु में गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे। छोटी उम्र में ही जगह-जगह सत्याग्रह करने लगे थे। वर्ष 1941 में उन्हें छह महीने की सजा मिली थी।
गांधी जी के आह्वान पर 1942 में पूरे देश में शुरू हुए अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान चंदौली में भी बड़ा आंदोलन हुआ था। 28 अगस्त 1942 सैयदराजा थाने पर झंडा फहराया गया था।
इस दौरान अंग्रेजों की गोलियों से श्रीधर, फेकू और गणेश शहीद हो गए थे। वहीं रामनरेश सिंह, बरहनी के रामधनी सिंह, अरंगी के रामदेव सिंह और जोखन सिंह सहित कई लोग घायल हुए थे। इस आंदोलन की याद में चंदौली और सैयदराजा में बने शहीद स्मारक में रामनरेश सिंह का भी नाम दर्ज है। 1942 के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने पर उनकी गिरफ्तारी का आदेश हो गया था और घर की कुर्की भी हुई थी। बाद में हाजिर होने पर उन्हें छह महीने की सजा हुई। संवाद