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Sawan Special: ऐसा शिवलिंग जो देता है बारिश के संकेत, शक्ति के आगे हार गए थे अंग्रेज, अद्भुत है कहानी

Wed, 12 Jul 2023 11:38 AM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंदौली

सार

राजेश पंडा ने बताया कि बाबा बारिश का संकेत भी देते हैं। बारिश के पूर्व शिवलिंग पर काई जम जाती है। श्रद्धालुओं द्वारा रगड़-रगड़ कर साफ करने के बाद दोबारा काई जम जाती है। वहीं सूखे के दौरान काई नहीं जमती। ऐसी स्थिति में अरघे के छेद को बंद कर उसमे गंगाजल भर देवाधिदेव का आह्वान किया जाता है।
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Kaleshwar Mahadev Temple, Chandauli - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सकलडीहा के बरठी गांव में स्थित कालेश्वर महादेव का स्वयंभू शिवलिंग बारिश का पहले ही संकेत दे देता है। इसमें बारिश से पूर्व काई जम जाती है, जो बार-बार साफ करने के बाद भी रहती है। इसे बारिश का संकेत माना जाता है। 1928 में मंदिर परिसर को तोड़कर प्लेटफार्म बनाने आए अंग्रेज अधिकारी की मृत्यु हो गई। जिसके बाद हार मानकर अंग्रेजों ने काम रूकवा दिया। मंदिर के पास अंग्रेज अधिकारी की मौत का शिलापट्ट इसका गवाह है। वहीं पुरारी राजेश पंडा ने बताया कि शिवलिंग के दर्शन से अकाल मृत्यु नहीं होती।वहीं पूरा करघा भर देने के बाद भी शिवलिंग नहीं डूबता। मान्यता है कि शिवलिंग हर क्षण कुछ-कुछ बढ़ता है।

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सकलडीहा-बरठी स्थित बाबा कालेश्वर नाथ मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट से सम्बद्ध भारत के चंद शिवालयों में से एक है। इसकी महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है। क्योंकि यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है। मंदिर के पुजारी राजेश पंडा ने इसके इतिहास के बारे में बताया कि वर्ष 1800 के करीब राजस्थान के अलवर जिले से राजपूताना काफिला सकलडीहा कोट में ठहरा था। बनारस स्टेट के बाबू बख्त सिंह सेनापति हुआ करते थे। उन्होंने एक दिन स्वप्न में स्वयंभू कालेश्वर महादेव का दर्शन होने के बाद चतुर्भुजपुर बरठी गांव के समीप मंदिर का खोदाई कराया। जमीन के अंदर से भगवान स्वंयभू भोलेनाथ की अवतरित शिवलिंग दिखाई पड़े। इसके बाद सेनापति बाबू बख्त सिंह ने मंदिर का निर्माण कराया। जिसके बाद बाबा के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ जुटने लगी।

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कालेश्वर महादेव मंदिर के पास अंग्रेजों की ओर से लगाया गया शिलापट्ट। - फोटो : अमर उजाला
वर्ष 1928 में यहां रेलवे स्टेशन का निर्माण कराया जा रहा था। रेल पथ इंजीनियर और ब्रिटिश अधिकारी रॉबिन विक्टर एग्जलेंडर स्टॉक ने प्लेटफार्म के विस्तार के लिए मंदिर की दहलीज तोड़कर चौड़ा करने की योजना बनायी। इसके लिए वह अपने विशेष सैलून से निरीक्षण करने आ रहा था कि उसकी सैलून मंदिर के पास ही 4 अगस्त 1928 को पलट गई। जिसमें उसकी मौत हो गई। ब्रिटिश अधिकारी की मौत के बाद मौके पर उसकी पत्नी पहुंची और उन्होंने काम का बंद करा दिया। अंग्रेज अधिकारी की मौत की सूचना आज भी मंदिर परिसर के पास अंग्रेजों द्वारा बनाई गई एक शिलापट्ट में अंकित है।

राजेश पंडा ने बताया कि बाबा बारिश का संकेत भी देते हैं। बारिश के पूर्व शिवलिंग पर काई जम जाती है। श्रद्धालुओं द्वारा रगड़-रगड़ कर साफ करने के बाद दोबारा काई जम जाती है। वहीं सूखे के दौरान काई नहीं जमती। ऐसी स्थिति में अरघे के छेद को बंद कर उसमे गंगाजल भर देवाधिदेव का आह्वान किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि अरघा ऊंचा होने के बावजूद भी शिवलिंग कभी पूरी तरह नहीं डूब पाता है। सावन के प्रत्येक सोमवार को दूर-दराज इलाकों से आस्थावानों का सैलाब कालेश्वर महादेव के जलाभिषेक के लिए उमड़ता है। पूरे सावन यहां मेला जैसा दृश्य होता है।
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