कालेश्वर महादेव मंदिर के पास अंग्रेजों की ओर से लगाया गया शिलापट्ट।
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वर्ष 1928 में यहां रेलवे स्टेशन का निर्माण कराया जा रहा था। रेल पथ इंजीनियर और ब्रिटिश अधिकारी रॉबिन विक्टर एग्जलेंडर स्टॉक ने प्लेटफार्म के विस्तार के लिए मंदिर की दहलीज तोड़कर चौड़ा करने की योजना बनायी। इसके लिए वह अपने विशेष सैलून से निरीक्षण करने आ रहा था कि उसकी सैलून मंदिर के पास ही 4 अगस्त 1928 को पलट गई। जिसमें उसकी मौत हो गई। ब्रिटिश अधिकारी की मौत के बाद मौके पर उसकी पत्नी पहुंची और उन्होंने काम का बंद करा दिया। अंग्रेज अधिकारी की मौत की सूचना आज भी मंदिर परिसर के पास अंग्रेजों द्वारा बनाई गई एक शिलापट्ट में अंकित है।
राजेश पंडा ने बताया कि बाबा बारिश का संकेत भी देते हैं। बारिश के पूर्व शिवलिंग पर काई जम जाती है। श्रद्धालुओं द्वारा रगड़-रगड़ कर साफ करने के बाद दोबारा काई जम जाती है। वहीं सूखे के दौरान काई नहीं जमती। ऐसी स्थिति में अरघे के छेद को बंद कर उसमे गंगाजल भर देवाधिदेव का आह्वान किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि अरघा ऊंचा होने के बावजूद भी शिवलिंग कभी पूरी तरह नहीं डूब पाता है। सावन के प्रत्येक सोमवार को दूर-दराज इलाकों से आस्थावानों का सैलाब कालेश्वर महादेव के जलाभिषेक के लिए उमड़ता है। पूरे सावन यहां मेला जैसा दृश्य होता है।