जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में प्राकृतिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थलों की कमी नहीं है, लेकिन स्थानीय प्रशासन तथा पर्यटन विभाग की उदासीनता के चलते इन केन्द्रों का विकास बाधित है। इससे दूरदराज से आने वाले पर्यटकों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
जिले में प्राकृतिक दृष्टि से संपन्न पर्वतीय वन क्षेत्र में राजदरी, देवदरी, औरवाटांड़ जैसे मनोहारी जलप्रपात हंै। उनकी प्राकृतिक सुंदरता को आत्मसात करने के लिए देश के ही नहीं विदेशों से प्रति वर्ष सैलानी आते हैं, लेकिन आरक्षित वन क्षेत्र में स्थित होने के कारण इन पर्यटन केन्द्रों के विकास का जिम्मा वन विभाग के पास है। प्रदेश का पर्यटन विभाग यदि उनका विकास करना चाहे तो भी पैसा वन विभाग को ही देना अनिवार्य हैं। इसलिए राजदरी तथा देवदरी जलप्रपात के आस-पास वन विश्राम गृह, यात्री शेड तथा रेलिंग के अलावा कुछ भी नहीं हैं। वहीं इन जल प्रपातो पर पेयजल सुविधा का अभाव है।
यहां आने वाले बाइक सवारों को प्रति व्यक्ति बीस रुपये देने होते हैं। जबकि चार पहिया वाहन से जाने वाले को सौ रुपये चुकाने पड़ते हैं। इसी तरह विदेशी को प्रति व्यक्ित छह सौ रुपये अदा करने पड़ते हैं। वन क्षेत्र में मूसाखाड़, नौगढ़, चन्द्रप्रभा बाध तथा लतीफशाह बीयर भी सैलानियों की पसंद हैं। इसके साथ ही जिले में बाबा कीनाराम की जन्मस्थली, पड़ाव स्थित बाबा अवद्यूत भगवान श्री राम का आश्रम, बाबा जागेश्वरनाथ धाम, घुरहुपुर बौद्ध बिहार, चकिया काली मंदिर, लतीफशाह बाबा की मजार, बाबा कालेश्वरनाथ मंदिर, वेद व्यास मंदिर सहित तमाम धार्मिक केन्द्र हैं। इनका विकास कर पर्यटन की संभावनाएं बढ़ाई जा सकती हैं। बावजजूद इसके जिले में पर्यटन विकास के नाम पर फूटी कौड़ी भी नही मिलती है। इन स्थानो को पर्यटन की दृष्टि से प्रचारित करने में भी जिला प्रशासन की कोई रूचि नही दिखती हैं। पर्यावरण विद परशुराम सिंह कहते हैं कि वन क्षेत्र में स्थित पर्यटन केन्द्रों के विकास के लिए वन कानूनों में संशोधन की जरूरत है।