हरियाणा से साइकिल से पं.बंगाल जा रहे श्रमिक।
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पीडीडीयू नगर। कोरोना वायरस से बचने के लॉक डाउन और सामाजिक दूरी का पालन कर रहे मजदूरों पर भारी पड़ रही है। भूखे प्यासे सिर्फ घर पहुंचने की चाहत में उनके हर कदम बेबसी में आगे बढ़ रहे हैं। बॉर्डर से पैदल, ट्रक एवं अन्य वाहन से रोजाना करीब दो हजार श्रमिक घरों को लौट रहे हैं। इस चिलचिलाती धूप में कामगारों के बढ़ते हर कदम उनकी विवशता को बयां कर रहे हैं।
सोमवार को 10 से अधिक श्रमिक हरियाणा से साइकिल से चलकर बिहार बॉर्डर पर सैयदराजा के पास पहुंच गए। भूखे प्यासे श्रमिकों को लोगों ने पानी पिलाया। वही ठेले पर ककड़ी मिली तो खाकर अपनी भूख मिटाई। ये सभी श्रमिक पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं। राजकुमार, बहादुर, बासु, शेमल, विश्वजीत ने बताया कि वह हरियाणा सोनीपत में मजदूरी करते थे, लेकिन लाकडाउन होने के बाद काम न होने के कारण साइकिल से ही अपने घर चल दिए। बताया कि एक सप्ताह से लगातार चल रहे हैं। उन्हें पश्चिम बंगाल के मालदा जाना है। इसी तरह ट्रक और पैदल से श्रमिक अपने अपने घरों को रवाना हो रहे है।
पीडीडीयू नगर। सपनों की नगरी मुंबई ने लॉकडाउन में सपनों को तोड़ दिया। हमारे सामने तो सांप छूछूंदर वाली स्थिति हो गई। वहां रहते तो भी मरते और चले भी तो गारंटी नही है कि घर पहुंच जाएंगे। यह दर्द मुंबई से पैदल ही मधुबनी जा रहे श्रमिकों ने व्यक्त किए।
बिहार के मधुबनी जिले के निवासी रामचरित्तर कामत 20 वर्ष पहले घर द्वार छोड़ कर सपनों की नगरी मुंबई में गया था। पावरलूम में काम लगा तो परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी हो गई। मुंबई अपना लगने लगा, इसी बीच लॉकडाउन लागू हो गया और सपनों की नगरी में उसे सारे सपने चकनाचूर हो गए। एक तरफ मुंबई मेें केरोना का बढ़ता प्रकोप और दूसरी तरफ खाने पीने की समस्या। स्थिति यह हो गई कि घर से पैसे मंगाए और ट्रक से घर जाने की सोची लेकिन बीच रास्ते में ट्रक वाले ने उतार दिया। अब पैदल घर जा रहे हैं। इसी तरह हाल लल्लन चौधरी ने भी बताया। कहा कि पावरलूम में काम कर प्रतिमाह घर पर पैसे भेजते थे लेकिन काम बंद होते ही पैसे पैसे के मोहताज हो गए। किसी तरह पत्नी ने गांव से कर्ज लेकर कुछ पैसे भेजे तो ट्रक से घर के लिए चला। बीच रास्ते में उतारने के बाद अब एक पैसा नहीं बचा। जहां कुछ मिल रहा है, वहीं खाकर रास्ता काटने को मजबूर हैं।