बाटनागाड़ के पास से हो रहा भूकटाव
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जिले में हर वर्ष सैकड़ों एकड़ भूमि गंगा में समाहित हो रही है। इससे गंगा के तटवर्ती इलाके के गांवों के ग्रामीणों में दहशत का माहौल व्याप्त है। बरसात के दिनों में जलस्तर में वृद्धि होने के साथ ही गंगा अपने किनारे पर स्थित भूमि को निगल रही है। किसानों की उपजाऊ भूमि गंगा में समाहित होती जा रही है। इससे किसान पलायन को मजबूर हैं। इस वर्ष भी सैकड़ों एकड़ जमीन गंगा में समाहित होने के डर से किसान सशंकित हैं। बावजूद इसके गंगा कटान को रोकने के लिए सरकार के पास कोई कार्य योजना नहीं है।
गंगा नदी में बढ़ रही सिल्ट की मात्रा के चलते जलस्तर बढ़ने पर गंगा दिनोंदिन अपना मार्ग बदल रही है और अपने तटवर्ती इलाकों को काटते हुए आगे बढ़ रही है। प्रशासनिक स्तर पर गंगा की तलहती में बढ़ रहे सिल्ट की साफ-सफाई के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। इसका खामियाजा गंगा के तटवर्ती इलाके के लोग उठा रहे हैं। जिले के दुलहीपुर क्षेत्र के कुंडा खुर्द गांव में हर वर्ष गंगा कटान के चलते दर्जनों एकड़ भूमि गंगा में समाहित हो रही है। पिछले वर्ष गंगा के जलस्तर में बढ़ोत्तरी होने पर गांव स्थित डीहबाबा मंदिर और दो पीपल के पेड़ गंगा में समाहित हो गए थे। वहीं बिसौरी-खुर्दा मार्ग भी गंगा कटान की भेट चढ़ गया।
वहीं धानापुर और चहनियां विकासखंड क्षेत्रों के गंगा किनारे बसे पुरा गनेश, पुरा विजयी, चकरा, टांडाकला, सोनबरसा, सरौली, महमदपुर, तिरगांवा, हसनपुर, बड़गांवा, दीया, प्रसहटा, चोचकपुर सहित दर्जनों गावों की करीब तीन सौ एकड़ भूमि पिछले तीन वर्षों में गंगा कटान की भेट चढ़ चुकी है। सरकार द्वारा इस पर रोक लगाने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। इससे किसानों में दहशत का माहौल व्याप्त है।