सुभाष पार्क के बगल में भीम की चाय की दुकान पर रविवार को कुछ लोग बैठे अपनी बातों में मशगूल ते। तभी एक युवक दौड़ते हुए दाखिल हुआ। उसके हाथ में एक प्रत्याशी का पंफ्लेट था। वह उसे बांटकर चला गया। जिस तेजी से आया और पर्चा बांट कर गया वह हतप्रभ करने वाला था। नई बस्ती के एक सज्जन ने कहा कि कार्यकर्ता है, उसे कम समय में ज्यादा संपर्क करना है। दूसरे सज्जन बोल पड़े ‘कार्यकर्ता नहीं ये घोड़ा है, नेताजी ने छोड़ा है’। फिर क्या था ठहाके गूंजने लगे। निकाय चुनाव के दौरान नगर की चाय की दुकानें चुनावी चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। चुनावी चकल्लस के लिए दुकानों पर चाय न पीने वाले भी सुबह-शाम जरूर चक्कर लगा रहे हैं। नामांकन और चुनाव चिह्न आवंटन के बाद प्रत्याशी गर्मी के बावजूद लगातार जनसंपर्क करने में लगे हैं। मतदान में दस दिन ही शेष हैं। समय कम है और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना है।
नेताजी अपने तईं संपर्क करने में लगे हैं लेकिन चुनाव का टेंपो तो चायखाने में बनता है। यहां प्याले से उठने वाला तूफान ही चुनाव की आंधी में बदलेगा। लिहाजा हर जगह प्रत्याशियों के समर्थक डेरा जमाए रहते हैं। सुबह और शाम को चुनावी चर्चा छिड़ती ही है। प्रत्याशियों चरित्र और व्यवहार की समीक्षा चायखानों में ही हो रही है।
सुभाष पार्क के पास भीम के चाय दुकान पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों का दिनभर जमावड़ा लग रहा है। यहां आने वाले हर कोई राजनीतिक विश्लेषक हो जाता है। बोलना शुरू करता है तो लगता है कि चुनाव की हवा और पानी उसकी मर्जी से ही चलते हैं। कौन प्रत्याशी जीत रहा और कौन हार रहा, इसका पूरा ब्योरा आप उनसे सुन सकते हैं। नई बस्ती के रामजी चौहान का कहना है कि चुनाव से जिंदगी की नीरसता खत्म होती है। कुछ लोगों को सुबह का नाश्ता और शाम का भोजन भी मिलता रहता है। कहीं घुघुरी और हलवा बट रहा है तो कहीं बाटी-चोखा लग रहा है। हर साल चुनाव आना चाहिए। उनकी बात के अंतिम शब्द ठहाकों में गुम हो गए।