स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि तटबंध की खराब स्थिति को लेकर दो महीने पूर्व ही सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता (एक्सईएन) को शिकायत दी गई थी, लेकिन इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। शनिवार को जब तटबंध टूटा तो तत्काल फोन कर अधिकारियों को सूचना दी गई, लेकिन एसडीएम तक ने फोन नहीं उठाया। अन्य प्रशासनिक अधिकारी भी तत्काल मौके पर नहीं पहुंचे।
स्थिति से आक्रोशित होकर ग्रामीणों ने मुगलसराय-गोधना मुख्य मार्ग को जाम कर विरोध प्रदर्शन किया। ग्रामीणों का कहना था कि यदि समय पर विभाग सक्रिय होता तो यह बड़ी आपदा टाली जा सकती थी।
घटना के पांच से छह घंटे बाद प्रशासनिक अमला मौके पर पहुंचा, जिसके बाद तटबंध की मरम्मत कार्य शुरू किया गया। लेकिन तब तक पूरे गांव के एक से दो किलोमीटर के दायरे में पानी फैल चुका था। ग्रामीणों के अनुसार, प्रशासनिक उदासीनता ने नुकसान को और बढ़ा दिया।
इस आपदा से सबसे ज्यादा किसान प्रभावित हुए हैं, जिनकी पूरी सालभर की मेहनत पानी में बह गई। खेतों में लगी धान की फसल, जो अभी बढ़ने की स्थिति में थी, पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। कई किसानों ने बताया कि उन्होंने कर्ज लेकर धान की बुवाई की थी, अब उनके सामने भरण-पोषण का संकट आ गया है।
प्रभावित ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से तत्काल मुआवजे की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है, इसलिए उन्हें समुचित राहत और क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए। घटना के बाद सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने अस्थायी तौर पर तटबंध को जोड़ने का कार्य शुरू किया है, लेकिन ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थायी समाधान नहीं किया गया तो भविष्य में इससे भी बड़ी दुर्घटना हो सकती है।
अभी भी कई घरों और खेतों में पानी भरा है। राहत और बचाव कार्य धीमी गति से चल रहा है। पशुओं को ऊंचे स्थानों पर पहुंचाया गया है और ग्रामीण जन सहयोग से अपने घरों से पानी निकालने में लगे हैं। यह घटना प्रशासनिक निष्क्रियता और समय रहते कार्रवाई न करने की गंभीर मिसाल बनकर सामने आई है। यदि शीघ्र पुनर्वास और सहायता की व्यवस्था नहीं की गई, तो इसका असर लंबे समय तक क्षेत्रीय जीवन और कृषि व्यवस्था पर रहेगा।