मंदिर के महंत अनूप गिरी।
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शिवलिंग पर गिरी कुल्हाड़ी तो निकलने लगा खून
मंदिर के महंत अनूप गिरी ने कथा ने बताया कि एक बार हाथीवान चारा काटने के लिए नदी के किनारे आया। वर्तमान में जहां शिवलिग है वहां विशाल वटवृक्ष था। उसी वृक्ष पर चढ़कर हाथीवान चारा (पेड़ की पत्तियां आदि) काटने लगा।
इसी बीच, कुल्हाड़ी ऊपर से गिर गई और नीचे गोलाकार पत्थर कट गया जिससे रक्त की धार चलने लगी। यह देख हाथीवान का मानसिक संतुलन बिगड़ गया। हाथी चिघाड़ करते हुए जंगलों में भाग गया। यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई।
आसपास बस्ती न होने के बावजूद कुछ दूर बसे गांव के लोग झाड़ी साफ कर पूजा-पाठ करना शुरू कर दिए। धीरे-धीरे उक्त पत्थर शिवलिंग का आकार लेकर विशालकाय होता गया। दशकों बाद दर्जनों गांव के धनाढ्य लोगों ने चंदा लगाकर भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
मंदिर के नाम कई किसानों ने जमीन भी दान स्वरूप दी। समीप स्थित रामजानकी मंदिर, मां दुर्गा मंदिर का निर्माण भी भक्तजनों ने कराया। स्थापत्य कला से मंदिर का निर्माण भारतीय धार्मिक स्थापत्य कला के अनुरूप मंदिर के बाहर द्वारपाल के रूप में देव प्रतिमाएं बाहर न होकर अंदर हैं, जबकि देवी पार्वती की मूर्तियां अंदर विराजमान हैं। सावन माह के अलावा वसंत पंचमी और शिवरात्रि में यहां भव्य समारोह आयोजित किए जाते हैं।
महंत अनूप गिरी की मानें तो काशीखंड के शिवलिंगों में महर्षि याज्ञवल्क्य की तपस्या से प्रकट हुए स्वयंभू बाबा यागेश्वरनाथ अब के जागेश्वनाथ का वर्णन है। शिवलिंग हर वर्ष जौ भर बढ़ते हैं। इस प्रमाण यह है कि इनके बढ़ने से अब तक सात अरघे टूट चुके हैं। अभी भी जो अरघा है, उस पर भी लकीर आ गई है, लेकिन चांदी से मढ़े जोन से वह दिख नहीं रहा है। सावन और शिवरात्रि में यहां दर्शन-पूजन के लिए लोगों की भारी भीड़ जुटती है।