पीडीडीयू नगर। मोबाइल फोन छीनने और उसमें हर महीने रिचार्ज न कराने पर 13 साल की बेटी अपने माता-पिता को आत्महत्या और घर छोड़कर भाग जाने की धमकी देती है। 8 साल का बच्चा मोबाइल छीनते ही घर का सामान तोड़ने लगता है और अभिभावकों को मारने-पीटने लगता है। 10 साल का बच्चा मोबाइल के लिए पेट दर्द बताकर रोने लगता है। कीनाराम मेडिकल कॉलेज में इस तरह के मामले रोज आ रहे हैं।
चंदौली के कीनाराम मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग के प्रभारी डॉ. नीतेश कुमार सिंह ने बताया कि ओपीडी में रोज करीब 200 मानसिक रोगी आते हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें 30 से ज्यादा बच्चे आ रहे हैं, जिनकी उम्र 5 से से 17 वर्ष होती है। इनमें भी 9-10 बच्चे रोज ऐसे आते हैं, जिनके अभिभावक उनकी मोबाइल फोन की लत से परेशान हैं। मोबाइल फोन छीनते ही बच्चे अगल-अलग तरह की भयावह हरकतें करने लगते हैं। डॉ. नीतेश ने बताया कि मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल से बच्चों में पॉपकॉर्न सिंड्रोम जैसी बीमारी हो रही है, जिससे उनकी एकाग्रता भंग हो रही है और बच्चे मानसिक रोगी होते जा रहे हैं। संवाद
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केस-1
पेट दर्द की शिकायत, मोबाइल देने की बात पर मुस्कुराने लगा
मानसिक रोग विभाग की ओपीडी में पांच दिन पहले 10 साल के बच्चे को उसके अभिभावक लेकर पहुंचे। परिजनों ने बताया कि बच्चे के पेट में 15 दिनों से तेज दर्द है। वह दर्द से कराहता और रोता है। पांच-छह डॉक्टरों को दिखाने के साथ हजारों रुपये खर्च कर कई जांचें भी करा चुके हैं, लेकिन दर्द का कारण सामने नहीं आया। बातचीत के दौरान पता चला कि 15 दिन पहले बच्चे से मोबाइल छीन लिया गया था। डॉ. नीतेश ने अभिभावकों से बच्चे को दिन में सीमित समय मोबाइल देने की बात कही। डॉक्टर के अनुसार, मोबाइल देने की बात सुनते ही बच्चे के चेहरे पर मुस्कान आ गई और उसने पेट दर्द की शिकायत भी बंद कर दी।
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केस बॉक्स-2
रिचार्ज नहीं कराया तो देने लगी जान देने की धमकी
13 साल की बेटी को उसकी मां मानसिक रोग विभाग लेकर पहुंचीं। मां ने बताया कि मोबाइल न देने और उसमें रिचार्ज नहीं कराने पर बच्ची आत्महत्या करने और घर छोड़कर भाग जाने की धमकी देती है। बच्ची की धमकी से परिवार इतना डर गया कि वे उसे मोबाइल देने के साथ हर महीने असीमित डेटा वाला रिचार्ज भी कराने लगे। परिजन चाहते हुए भी मोबाइल से दूरी नहीं बना पा रहे हैं। चिकित्सक ने बच्ची के व्यवहार को गंभीरता से लेते हुए अभिभावकों को निगरानी और विशेषज्ञ की सलाह लेने को कहा।
केस बॉक्स-3
परिवार के सदस्यों से करने लगता है मारपीट
नौ साल के बच्चे को उसकी दादी मानसिक रोग विभाग लेकर पहुंचीं। उन्होंने बताया कि बच्चा अधिकांश समय मोबाइल फोन चलाता है। थोड़ी देर के लिए भी मोबाइल छीनने पर वह गुस्से में घर का सामान पटककर तोड़ने लगता है। चिल्लाने के साथ माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को मारने लगता है। परिजन जब उसे मोबाइल वापस दे देते हैं तो वह शांत हो जाता है। इससे परिवार के सामने दोहरी परेशानी है। बच्चे का व्यवहार नियंत्रित करने के लिए मोबाइल देना आसान रास्ता बन गया है, लेकिन इससे उसकी मोबाइल पर निर्भरता और बढ़ने की आशंका रहती है।
इनसेट
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मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर नियंत्रण जरूरी
डॉ. नीतेश कुमार सिंह ने कहा मौजूदा समय में बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह दूर रखना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन इस्तेमाल का समय निश्चित करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि बच्चे को अकेले मोबाइल फोन देने के बजाय यह देखते रहें कि वह क्या देख रहा है। मोबाइल और इंटरनेट की अभिभावकीय नियंत्रण वाली सुविधाओं का इस्तेमाल करें। सोशल मीडिया और अन्य खातों की गोपनीयता और सुरक्षा सेटिंग मजबूत रखें। बच्चों के खाली समय को खेल, पढ़ाई, बातचीत और रचनात्मक गतिविधियों में लगाएं। पार्क, मैदान और नई जगहों पर ले जाएं, ताकि उनका समय मोबाइल के बजाय दूसरी गतिविधियों में बीते। अभिभावक खुद भी बच्चों के सामने लगातार मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने से बचें।
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इनसेट
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बच्चों में इन बदलावों को नजरअंदाज न करें
- मोबाइल छीनने या समय पूरा होने पर बच्चा अचानक चिड़चिड़ा और आक्रामक हो जाए।
- समय निर्धारित होने के बावजूद बच्चा बार-बार मोबाइल मांगता रहे और दूसरे काम में उसका मन न लगे।
- कितनी देर मोबाइल चलाया, क्या देखा या किससे बात की, इस बारे में झूठ बोलने लगे।
- मोबाइल के कारण पढ़ाई, खेल, किताब, दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताने में रुचि कम हो जाए।
- मोबाइल छिनने पर सिर या पेट दर्द, बेचैनी अथवा रोने जैसी शिकायत बार-बार सामने आए।
- रात में छिपकर मोबाइल चलाना, देर से सोना या सुबह उठने में परेशानी होने लगे।
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कोट
-रोज नौ से 10 बच्चे ऐसे पहुंच रहे हैं, जिनके अभिभावक उनकी मोबाइल फोन की लत से परेशान हैं। ऐसे बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, चिल्लाना और आक्रामक व्यवहार देखने को मिलता है। अभिभावकों को शुरुआत से ही बच्चों के मोबाइल के इस्तेमाल का समय निर्धारित करना चाहिए। आदत बढ़ जाने के बाद उसे नियंत्रित करना कठिन हो सकता है। - डॉ. नीतेश कुमार सिंह, प्रभारी, मानसिक रोग विभाग, कीनाराम मेडिकल कॉलेज।
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